सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस की ज्यादती की जांच कर रही कमेटी को अब तक बहुत कम शिकायतें मिली हैं। पर्याप्त जानकारी और साक्ष्यों के अभाव के चलते समिति अब तक किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। इसे देखते हुए शीर्ष अदालत ने समिति को अपनी शुरुआती जांच रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक महीने की अतिरिक्त मोहलत दी है।
चीफ जस्टिस और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि जंतर-मंतर हिंसा से संबंधित सभी लंबित याचिकाएं, वीडियो फुटेज और शिकायतें सीधे जांच समिति को सौंपी जाएं ताकि जांच को गति मिल सके।
पूर्व जज आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में बनी है उच्च स्तरीय समिति
छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति के अन्य सदस्यों में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायधीश शलिंदर कौर, CBI के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त DGP एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।
149 अखबारों में नोटिस, 21 अक्टूबर को दोबारा शिकायतें मांगीं
कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 13 अक्टूबर को शिकायत दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया था। इस पर शिकायतकर्ता को नाम, आधार नंबर या दूसरी पहचान संबंधी जानकारी देना जरूरी नहीं है। पोर्टल तक पहुंच सिर्फ कमेटी के चेयरमैन और संबंधित लोगों की है।
कमेटी ने देशभर के 149 अखबारों में सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित कर शिकायतें आमंत्रित की थीं। ईमेल, डाक और कार्यालय में सीधे शिकायत देने की सुविधा भी रखी गई थी। 17 अक्टूबर को प्रेस रिलीज जारी की गई और 21 अक्टूबर को दोबारा शिकायतें मांगी गईं। इसके बावजूद पोर्टल पर बहुत कम शिकायतें आईं और ईमेल, डाक या सीधे कार्यालय में कोई शिकायत नहीं मिली।
याचिकाकर्ताओं ने कहा- पहले ही सौंप चुके हैं शिकायतें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने कहा कि उन्होंने पोर्टल शुरू होने से पहले ही कमेटी को शिकायत दी थी। पोर्टल शुरू होने के बाद तय प्रक्रिया के तहत एक और शिकायत जमा कराई गई थी। सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल वीडियो और दूसरी सामग्री कमेटी को भेजी जा सकती है, ताकि हर पीड़ित को अलग-अलग पेश न होना पड़े। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले तीसरे पक्ष के लोग पीड़ितों की संख्या के बारे में दावा कर सकते हैं, जबकि वास्तविक संख्या अलग हो सकती है। उन्होंने उदाहरण दिया कि कोई 50 पीड़ितों का दावा करे, लेकिन वास्तव में सिर्फ 5 पीड़ित हों। ग्रोवर ने कहा कि हिंसा के मामलों में एक भी FIR दर्ज नहीं हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने की अनुमति किसने दी थी। उनके मुताबिक, कमेटी की रिपोर्ट में केंद्र सरकार ने इस मामले में कोई जानकारी नहीं दी है।
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