Automobile Desk : देश के चार पहिया वाहन बाजार में ग्राहकों की सोच और प्राथमिकता तेजी से बदल रही है। अब भारतीय कार खरीदार सिर्फ बुनियादी या कम बजट वाली गाड़ियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहतर फीचर्स, आधुनिक तकनीक और दमदार सेफ्टी के लिए ज्यादा बजट खर्च करने में परहेज नहीं कर रहे हैं। डेलोइट इंडिया (Deloitte India) की ताजा ऑटो रिपोर्ट ‘व्हीलवॉच’ के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में 12 लाख से 20 लाख रुपये की प्राइस रेंज वाली कारों की बिक्री में सबसे जोरदार उछाल दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें तो 12 से 20 लाख रुपये सेगमेंट की कारों की बिक्री में सालाना आधार पर 33.6 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। इस सेगमेंट की कुल बाजार हिस्सेदारी में भी 1.2 फीसदी का इजाफा हुआ है। इसके ठीक उलट, 7 लाख से 12 लाख रुपये की रेंज वाली गाड़ियों की मांग में मामूली 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, हालांकि कुल बिक्री में अभी भी इस ब्रैकेट का हिस्सा करीब आधा बना हुआ है। जीएसटी 2.0 से जुड़ी नीतिगत प्राथमिकताओं के बाद पैसेंजर व्हीकल्स की होलसेल (थोक) बिक्री 30.7 प्रतिशत बढ़कर 14 लाख यूनिट के पार पहुंच गई, जो पहली तिमाही की 25.9 प्रतिशत ग्रोथ से अधिक है।

ईंधन के मामले में भी भारतीय ग्राहकों का नजरिया बदल रहा है। अब लोग परंपरागत पेट्रोल कारों के बजाय ग्रीन फ्यूल और बचत देने वाले विकल्पों को तवज्जो दे रहे हैं। दूसरी तिमाही के दौरान पेट्रोल कारों का मार्केट शेयर 2.8 प्रतिशत घटकर 42.6 प्रतिशत पर आ गया। वहीं सीएनजी गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन में करीब 50 फीसदी का उछाल आया और यह आंकड़ा 2.33 लाख यूनिट तक पहुंच गया। गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में तो सीएनजी मॉडल की बिक्री ने पेट्रोल गाड़ियों को भी पीछे छोड़ दिया है। इसका मुख्य कारण कम रनिंग कॉस्ट और E20 फ्यूल से जुड़ी ग्राहकों की सतर्कता को माना जा रहा है।
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेगमेंट में भी रिकॉर्ड तेजी देखने को मिली है। ईवी के रजिस्ट्रेशन लगभग दोगुने होकर 97,000 यूनिट के स्तर पर जा पहुंचे, जिससे ईवी का मार्केट शेयर पहली तिमाही के 6 फीसदी से बढ़कर 6.7 फीसदी हो गया है। इसके अलावा, एसयूवी (SUV) सेगमेंट में कॉम्पैक्ट मॉडल्स का दबदबा बढ़ा है और इनकी हिस्सेदारी में 3.3 प्रतिशत का सुधार हुआ है। लोग अब छोटी एसयूवी में ही प्रीमियम गाड़ियों जैसा अनुभव पा रहे हैं, जिसके चलते मिड-साइज एसयूवी की हिस्सेदारी 1.9 प्रतिशत कम हुई है। कई खरीदार नई मिड-साइज एसयूवी के बजाय सेकेंड हैंड प्रीमियम ब्रांड्स की ओर भी रुख कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, गाड़ियों की थोक आपूर्ति और वास्तविक रिटेल डिलीवरी के बीच बढ़ता अंतर शोरूम डीलरों के लिए चुनौती बनता दिख रहा है। रिटेल बिक्री में जहां 22.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, वहीं कंपनियों द्वारा डीलरों को भेजी जाने वाली गाड़ियों का इन्वेंट्री स्टॉक लगातार बढ़ रहा है। जुलाई के अंत में डीलरों के पास करीब 33 से 35 दिनों का स्टॉक मौजूद था, जो सितंबर खत्म होते-होते बढ़कर 43 से 45 दिनों का हो चुका है। स्टॉक का यह बढ़ता स्तर आगामी समय में डीलरशिप मैनेजमेंट के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है।

