गौरव जैन, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ में इन दिनों लाखों क्विंटल धान गायब होने और सड़ने का मामला चर्चा में है, जिसकी कीमत करीब 30 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। कवर्धा, महासमुंद, जशपुर और बस्तर के धान खरीदी केंद्रों से कथित तौर पर “चूहों” द्वारा धान खा जाने की बात कही जा रही है, लेकिन अब जीपीएम जिले से एक और बड़ी लापरवाही की तस्वीर सामने आई है। यहां धान के ढेर खुले आसमान के नीचे पड़े-पड़े सड़ चुके हैं, 20 हजार से अधिक बोरियों में भरा अनाज काला पड़ गया है और उसमें कीड़े लग चुके हैं। यह हालात किसी प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और समय पर उठाव न होने का नतीजा प्रतीत होता है, जिसकी वजह से सरकारी खजाने को करोड़ों की चपत लगी है।


दरअसल, जिले के दो प्रमुख धान संग्रहण केंद्रों गौरेला (पेंड्रारोड) और गुल्ली डांड़ में रखे गए करीब 20 हजार बोरे अब खराब हो चुके हैं। इन बोरों में लगभग 8 हजार क्विंटल से अधिक धान सड़कर काली पड़ गई है। कई बोरियों में कीड़े लग चुके हैं, जिससे धान पूरी तरह अनुपयोगी हो गई है। खुले मैदान में रखी धान बारिश, नमी और धूप के बीच लंबे समय तक पड़ी रही, लेकिन न तो उसे सुरक्षित गोदामों में रखा गया और न ही समय पर कस्टम मिलिंग के लिए उठाव कराया गया।
दरअसल, जिले के दो अलग-अलग धान संग्रहण केंद्रों गौरेला (पेंड्रारोड) और गुल्ली डांड़ की, जहां लगभग 20 हजार धान से भरे बोरे या तो सड़ गए हैं या इन बोरियों में भरी धान खराब होकर काली पड़ गई है, जिसमें अब कीड़े भी लग चुके हैं। इन 20 हजार बोरों में लगभग 8 हजार क्विंटल से अधिक की धान सड़कर काली पड़ चुकी है। वहीं गौरेला धान संग्रहण केंद्र की अगर बात करें तो वहां धान सड़कर उसमें कीड़े भी लग चुके हैं, जो किसी प्रकार से उपयोग में नहीं लाई जा सकती।
इस 8 हजार क्विंटल से अधिक धान की कीमत करोड़ों रुपये से भी अधिक आंकी जा रही है। इतनी बड़ी मात्रा में धान का खराब होना कहीं न कहीं विपणन विभाग की नाकामी को दर्शाता है। सवाल यह उठता है कि समय रहते खुले आसमान के नीचे पड़ी धान का कस्टम मिलिंग के लिए उठाव क्यों नहीं किया गया, या फिर मौसम की मार से बचाने के लिए इन संग्रहण केंद्रों में समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की गई? इतनी बड़ी मात्रा में धान की बर्बादी के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? इस नुकसान से शासन को करोड़ों रुपये की हानि होते हुए दिखाई दे रही है।
क्या कहते हैं अधिकारी
इस मामले में जिला विपणन अधिकारी हरीश शर्मा का कहना है कि धान केंद्रों में पड़ी धान के उठाव के लिए डीओ (DO) पहले ही काटा जा चुका है। राइस मिलर्स अब धान के उठाव को तैयार हैं और अगले कुछ दिनों में दोनों जगहों से पूरी धान का उठाव हो जाएगा। कुछ राइस मिलर्स के ऊपर जुर्माना भी लगाया जा रहा है। जिला अधिकारी का कहना है कि इस सड़ी धान का उपयोग भी उसना के रूप में किया जा सकता है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जब संग्रहण केंद्रों में पड़ी धान का कस्टम मिलिंग के लिए डीओ काटा जा चुका था, तो इतने दिनों बाद भी धान का उठाव मौके से क्यों नहीं किया गया? क्या किसी भ्रष्टाचार के चलते जानबूझकर खरीदी गई धान को खुले आसमान के नीचे सड़ने के लिए छोड़ दिया गया?
छत्तीसगढ़ को देश का “धान का कटोरा” कहा जाता है, लेकिन लगातार धान की ऐसी बर्बादी प्रदेश की छवि पर भी सवाल खड़े कर रही है।
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