Automobile Desk: देशभर में यातायात नियमों को लेकर प्रशासनिक कसावट अब काफी सख्त हो चुकी है। दोपहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट न लगाना हो, चौराहे पर रेड लाइट जंप करना हो या फिर अन्य किसी भी ट्रैफिक नियम का उल्लंघन करना, इन सभी पर भारी-भरकम जुर्माने के साथ चालान काटने की कार्रवाई आम बात बन चुकी है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में वाहन चालकों के पास पुराने पेंडिंग चालान जमा होते जाते हैं। इन लंबित मामलों के त्वरित और सुगम निपटारे के लिए समय-समय पर विशेष लोक अदालतों का आयोजन किया जाता है, जहां ड्राइवरों को अपने बकाये जुर्मानों को कम करवाने या आपसी समझौते के आधार पर मामलों को बंद करवाने का एक बेहतरीन अवसर मिलता है।
तमाम वाहन चालकों के मन में अक्सर यह गलतफहमी घर कर जाती है कि लोक अदालत में पहुंचने पर हर तरह के ट्रैफिक चालान पूरी तरह माफ या खारिज कर दिए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। कानून के जानकारों के मुताबिक, कुछ विशेष और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में सामान्य ट्रैफिक चालान जैसी छूट या राहत का प्रावधान नहीं होता है। यदि आप भी अपने किसी पुराने पेंडिंग चालान का निस्तारण कराने की योजना बना रहे हैं, तो यह जान लेना बेहद आवश्यक है कि किन परिस्थितियों में आपको किसी भी प्रकार की रियायत मिलने की उम्मीद बिल्कुल नहीं रखनी चाहिए।
शराब पीकर वाहन चलाना (ड्रिंक एंड ड्राइव)
सड़क सुरक्षा के नियमों के अंतर्गत नशे की हालत में गाड़ी चलाना एक बेहद गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना अपराध माना जाता है। इस तरह के मामलों में कानून के लंबे हाथ पूरी तरह सख्त रुख अपनाते हैं और इसमें आरोपी चालक को अनिवार्य रूप से कठोर अदालती प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। यही कारण है कि ड्रिंक एंड ड्राइव के तहत कटे हुए चालान को एक सामान्य ट्रैफिक फाइन मानकर लोक अदालत में उसकी पूरी माफी की कल्पना करना भारी भूल साबित हो सकता है। ऐसे मामलों में होने वाली कानूनी कार्रवाई पूरी तरह से घटना की गंभीरता और लागू नियमों के दायरे पर निर्भर करती है, इसलिए संबंधित फोरम से ही उचित मार्गदर्शन लिया जाना चाहिए।
गंभीर सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े प्रकरण
यदि किसी मोटर वाहन की वजह से कोई गंभीर सड़क हादसा हुआ है और मामला बढ़कर पुलिस जांच या आपराधिक अदालत की दहलीज तक पहुंच चुका है, तो उसे किसी साधारण चालान की श्रेणी में रखकर नहीं निपटाया जा सकता। इस प्रकार के संवेदनशील मामलों में पीड़ित पक्ष की स्थिति, हादसे की भयावहता और अन्य कानूनी प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन करके ही आगे की न्यायिक कार्रवाई तय होती है। इसलिए हर दुर्घटना से जुड़े मामले में यह मान बैठना कि लोक अदालत के जरिए झटके में जुर्माना माफ हो जाएगा, पूरी तरह निराधार है।

खतरनाक ड्राइविंग और स्टंटबाजी के मामले
सार्वजनिक मार्गों पर अंधाधुंध रफ्तार से गाड़ियां भगाना, लापरवाही से स्टंट करना या फिर अन्य राहगीरों की जान को सीधे तौर पर खतरे में डालना कानून की नजर में गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। अत्यधिक तेज गति (ओवरस्पीडिंग) से वाहन चलाने पर भी ट्रैफिक पुलिस द्वारा सख्त कदम उठाए जाते हैं, खासकर तब जब इससे सड़क पर चल रहे आम नागरिकों की सुरक्षा को बड़ा जोखिम पैदा हो। इन तमाम परिदृश्यों में राहत मिलेगी या नहीं, यह पूरी तरह से अपराध की प्रकृति पर निर्भर करता है। यही कारण है कि हर ओवरस्पीडिंग चालान को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त वाहन
यदि किसी वाहन का इस्तेमाल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी आपराधिक गतिविधि में किया गया है और उस संबंध में पुलिस अथवा कोर्ट में विधिवत केस चल रहा है, तो उसे अन्य सामान्य ट्रैफिक चालानों से बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जाता है। केवल लोक अदालत के मंच पर पहुंच जाने मात्र से इस तरह के जटिल मामले स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। इसमें मूल आपराधिक मुकदमे की वर्तमान स्थिति और अदालती निर्देश सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।
किन मामलों में मिल सकती है राहत?
दूसरी ओर, लोक अदालत के माध्यम से कुछ चुनिंदा और सामान्य प्रकृति के ट्रैफिक चालानों का आसानी से निपटारा किया जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से बिना हेलमेट या seat belt के गाड़ी चलाना, नो-पार्किंग जोन में वाहन खड़ा करना और कुछ अन्य छोटे-मोटे नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामले शामिल होते हैं। हालांकि, यहां भी यह जरूरी नहीं है कि हर चालान का जुर्माना कम ही हो जाए या वह पूरी तरह खारिज हो जाए, यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।

