Odisha Desk, संबलपुर: पश्चिमी ओडिशा की कृषि संस्कृति में अक्षय तृतीया के दिन पहले बीज बोने से लेकर फसल को घर लाने तक, हर चरण एक पारंपरिक अनुष्ठान के साथ संपन्न होता है। इन सभी अवसरों में ‘नुआखाई’ का स्थान अत्यंत विशेष और पवित्र माना गया है। खेतों में फसल पूरी तरह पकने से पहले, जब धान के दाने कोमल और दूधिया होते हैं, तब पहली फसल को काटकर इष्टदेवी को समर्पित करने की यह परंपरा प्रकृति और माटी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनुपम उदाहरण है।
नाम का अर्थ और कृतज्ञता की भावना
‘नुआ’ का अर्थ है ‘नया’ और ‘खाई’ का अर्थ है ‘खाना’। हालांकि, नुआखाई केवल नया अन्न खाने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का एक माध्यम है। लोक मान्यता है कि पक्षियों और जीव-जंतुओं के फसल चखने से पहले और बाज़ार में इसका कोई आर्थिक मूल्य तय होने से पहले, धरती माता और स्थानीय देवी-देवताओं का इस पहली उपज पर पहला अधिकार होता है। इसलिए, किसान अपनी मेहनत के पहले फल को अपनी इष्टदेवी के चरणों में अर्पित करते हैं।
12वीं शताब्दी से जुड़ा ऐतिहासिक इतिहास
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, नुआखाई के संगठित और संस्थागत रूप की शुरुआत 12वीं शताब्दी में हुई थी। पाटनागढ़ (वर्तमान बलांगीर जिला) के चौहान वंश के प्रथम राजा रमई देव (Raja Ramai Deo) ने इस पर्व को एक बड़ा सामाजिक और कृषि उत्सव बनाया था। राजा ने कृषि को समृद्धि का मुख्य आधार मानते हुए लोगों को शिकार और खानाबदोश जीवन से स्थायी खेती की ओर प्रेरित किया था। समय के साथ यह उत्सव पाटना राज्य की सीमाओं को पार कर छत्तीसगढ़ और झारखंड के पड़ोसी क्षेत्रों तक फैल गया, जो 1936 में भाषाई आधार पर ओडिशा राज्य के गठन से पहले एक ही सांस्कृतिक भूभाग का हिस्सा थे।
ग्रामीण परंपराएं और ‘झांकर’ की भूमिका
नुआखाई का वास्तविक स्वरूप भव्य मंदिरों की भव्यता में नहीं, बल्कि गांव के खुले आसमान और प्राचीन वृक्षों की छांव में स्थापित ग्राम देवी के समक्ष दिखाई देता है। आमतौर पर कंध (Kondh) समुदाय से आने वाले पारंपरिक ग्रामीण पुजारी, जिन्हें ‘झांकर’ (Jhankar) कहा जाता है, पूरे गांव की ओर से ग्राम देवी को सबसे पहला ‘नुआ’ (नया अन्न) अर्पित करते हैं।
अनुष्ठान और पारिवारिक एकता
गांव के मुख्य अनुष्ठान पूरे होने के बाद ही परिवार अपने-अपने घरों के आंगन में नया अन्न लाते हैं। दिनभर परिवार की महिलाएं और सदस्य उपवास रखते हैं और घर में पूजा-अर्चना के बाद ही नए धान से बना प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद ‘नुआखाई जुहार’ (Nuakhai Juhar) की परंपरा शुरू होती है, जिसमें छोटे बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और समवयस्क एक-दूसरे को गले लगाकर शुभकामनाएं देते हैं। माटी, जंगल और संस्कृति को एक सूत्र में बांधने वाला यह पर्व आज भी सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बना हुआ है।
Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H



