Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor

प्राइवेट सेक्रेटरी टू शाह

जैसे ही 2008 बैच के आईएएस नीरज बंसोड़ को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पर्सनल सेक्रेटरी बनाया गया, राज्य में सरकार के साथ-साथ कई आला अफसरों की भौंहे तन गई. नीरज बंसोड़ की खूबियों को लेकर चर्चा होने लगी. चर्चा होनी भी थी. किसी और मंत्री का पर्सनल सेक्रेटरी बनना एक आम बात है, लेकिन अमित शाह का बनना खास हो जाता है. मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत वाले शाह की दिलचस्पी छत्तीसगढ़ को लेकर बढ़ी भी है. पहले उन्होंने संसदीय प्रवास के लिए देशभर में कई विकल्पों के बीच छत्तीसगढ़ के कोरबा को चुना और अब नीरज बंसोड़ के रुप में छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी को. चुनावी साल में अमित शाह की छत्तीसगढ़ पर टिकी हुई नजर का अपना गणित हो सकता है. इधर राज्य में केंद्रीय जांच एजेसियों की सक्रियता से हर कोई वाकिफ है. कई बड़ी एजेंसियों की सीधी कमान शाह के हाथों ही है. बंसोड़ के पर्सनल सेक्रेटरी बनने के बाद ब्यूरोक्रेसी में अब चर्चा चल रही है कि राज्य के कई ऐसे अधिकारी जो एजेंसियों के राडार पर है, उन्हें बंसोड़ के रुप में शाह तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया मिल जाएगा. ये बात और है कि अमित शाह तो अमित शाह हैं.

छोटी पारी…

कई जिलों में एसपी के रुप में मैराथन पारी खेलने के बाद पारुल माथुल एंटी करप्शन ब्यूरो भेजी गई थी. डीआईजी प्रमोट होने के बाद यह उनकी ताजातरीन पोस्टिंग थी, मगर महज 13 दिनों में ही वह तबादले की जद में आ गईं. जब एंटी करप्शन ब्यूरो भेजी गई थीं, तब तरह-तरह की चर्चा हुई थी. ये तक सुना गया था कि डी एम अवस्थी के रिटायरमेंट के बाद पारुल माथुर पहली महिला आईपीएस होंगी, जिन्हें एसीबी चीफ बनाया जा सकता है. मगर अढ़ाई दिनों की बादशाहत वाली कहावत शायद ऐसे ही किस्सों के लिए बनाई गई होगी. विदाई की चिट्ठी जारी हो गई.

कांप्रोमाइज्ड नेता

बीजेपी के एक शीर्ष नेता हाल ही में हुई एक बड़ी बैठक में तमतमा गए. उन्होंने इशारों में ही सही दो टूक कह दिया कि उन्हें यह मालूम है कि बीजेपी के कौन-कौन से बड़े नेता हैं, जो सरकार से गलबहियां कर रहे हैं. सरकार से कांप्रोमाइज्ड हैं. यह सुनते ही सभी धुरंधर नेता एक-दूसरे की ओर ताकने लग गए. हर कोई एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगा. अब तक आंतरिक चर्चाओं में बीजेपी नेताओं के साथ भूपेश सरकार के करीबी संबंधों का जिक्र होता रहा था, मगर अब खुलकर चर्चा होने लगी. शीर्ष नेता ने यह भी बोल दिया कि नेता जमीन पर संघर्ष करते दिख जाए. सरकार के खिलाफ बयानों की शक्ल में जहर उगले. ऐसा ना करने वाले खुद ब खुद पहचान लिए जाएंगे. मरता क्या ना करता वाली कहावत चरितार्थ होते दिखने लगी. सुनते हैं कि उस बैठक के बाद नेता अब अपने दोस्तों-यारों की महफिल में भी भूपेश सरकार को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं. जिन-जिन लोगों ने सरकार को गालियां नहीं बकी थी, वह आइना के सामने खड़े होकर गाली बकने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. आखिर मामला टिकट पर आ टिका है. जो जितनी गालियां देगा, उतना ही संगठन का भरोसा जितेगा. सुना तो यह तक गया है कि ईडी की जांच के दौरान मिले दस्तावेजों में बीजेपी के कई बड़े नेताओं के नाम भी सामने आए हैं. दिल्ली के नेताओं तक नामों की सूची पहुंच चुकी है. पिछले दिनों एक बड़े नेता पर हुई कार्रवाई इसी कड़ी का एक हिस्सा रहा था.

एआईसीसी का नोटिस

एआईसीसी की डिसिप्लनरी एक्शन कमेटी ने संगठन महामंत्री अमरजीत चावला और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों के तहत नोटिस जारी कर दिया. नेताम भानुप्रतापपुर चुनाव में खुलकर सर्व आदिवासी समाज के उम्मीदवार के पक्ष में खड़े नजर आए थे. वहीं अमरजीत चावला पर आरोप है कि आरक्षण के मुद्दे पर पूरी पार्टी जब राज्यपाल के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी, तब चावला राज्यपाल के समर्थन में खड़े रहे. बहरहाल इन सबके बीच कांग्रेस संगठन में एक चर्चा जोरशोर से गूंजी. बताते हैं कि पिछले दिनों कांग्रेस के अधिवेशन की तैयारियों के सिलसिले में संगठन महामंत्री के सी वेणुगोपाल, महासचिव तारिक अनवर, प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा सरीखे नेता छत्तीसगढ़ पहुंचे थे, तब सत्ता-संगठन के बीच बिगड़े तालमेल की जानकारी आला नेताओं को दी गई.संगठन की मनमानी से मुख्यमंत्री की नाराजगी को भी आला नेताओं से साझा किया गया. खबर है कि बंद कमरे में मुख्यमंत्री की आला नेताओं से बात भी हुई. इस बातचीत के दौरान ना तो कुमारी शैलजा भीतर थी और ना ही पीसीसी चीफ मोहन मरकाम. दोनों को बाहर किया गया था. भीतर की बात बाहर तो नहीं आई, मगर संगठन सूत्र कहते हैं कि सत्ता-संगठन के बीच आई दरारों को लेकर खुलकर चर्चा की गई थी. वरिष्ठ नेताओं की मानें तो कुमारी शैलजा द्वारा सर्किट हाउस में पिछले दिनों विधायकों की ली गई बैठक की जानकारी संगठन ने मुख्यमंत्री को नहीं दी. इससे पहले भी कई महत्वपूर्ण बैठकों की सूचना भी मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचाई गई. बहरहाल चुनावी साल में हाईकमान थोड़ा भी रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है. सुनते हैं कि दरारों को भरने की रणनीति पर काम तेज हो गया है.

सेटलमेंट

पुलिस समाज में सुरक्षा का भरोसा जगाती है, मगर कुछ किरदार यहाँ भी मिल जाते हैं जिन्हें भरोसे पर चोट करने से कोई गुरेज़ नहीं. हाल के दिनों में एक वीआईपी ज़िले के वीआईपी इलाक़े में एक मकान में चोरी हो गई. चोर लाखों के ज़ेवर और नक़दी ले उड़े. इलाक़ेके थाना प्रभारी ने एक हफ़्ता बीत जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं की. पीड़िता ऊपर के अफ़सरों के पास न्याय की गुहार लियेपहुँच गई. अफ़सरों के निर्देश के बाद जाँच शुरू हुई. एक आरोपी को गिरफ़्तार किया गया. मगर असल खेल इसके बाद शुरू हुआ. चोरने चोरी का जेवर एक सराफा कारोबारी को बेच दिया था. चोर की निशानदेही पर सराफा कारोबारी को उठाया गया. पूरे मामले को रफादफा करने कुछ लोग एक्टिव हुए. बैठकी हुई. दस लाख रुपये में डील तय हुई, लेकिन थाना प्रभारी तक पाँच लाख ही पहुँचा. मामले मेंदिलचस्प मोड़ तब आया जब एसपी तक सेटलमेंट की आडियो रिकॉर्डिंग पहुँच गई. बवाल कट गया. एसपी में थाना प्रभारी की जमकरक्लास लगा दी. साथ ही पूरे रायते को साफ़ करने के निर्देश दे दिया. मालूम चला है कि सराफ़ा कारोबारी से पीड़ित पक्ष को चोरी हुएज़ेवर और कुछ नगदी रक़म दिलाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.