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(सुधीर दंडोतिया की कलम से)
मंत्रीजी कार्यक्रम या बैठक में हैं
हैलो… मंत्रीजी कार्यक्रम में हैं. मंत्रीजी बैठक ले रहे हैं. नई सरकार में पहली बार मंत्री बने बीजेपी विधायकों के पर्सनल नंबर पर फोन लगाने पर यही जवाब मिल रहे हैं. काॅल रिसीव करने वाला शख्स या तो निजी पीए होता है या फिर पीएचओ. मंत्रीजी घर पर हों, या कार से सफर कर रहे हों. काॅल रिसीव होने के बाद अधिकांशतः इन दो में से कोई एक जवाब ही मिल रहा है. चर्चा इस बात को लेकर है कि आने वाले समय में जब बैठक और कार्यक्रमों का दौर शुरू होगा. तब क्या होगा.
खुद ही तय कर लिए थे सरकारी विभाग
मतगणना के बाद कौन किस भूमिका में रहेगा. प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल के नेताओं ने सरकार में खुद की भूमिका खुद ही तय कर ली थी. रिजल्ट के बाद सरकार बनने पर सरकार के कौन के विभाग का कामकाज देखना है. प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बैठने वाले नेताओं ने इस संबंध में खुद का विभाग तय कर आपस में बातचीत कर ली थी. अब महीनेभर बाद भी कार्यालय में इस बात की चर्चा आम है कि यदि सरकार आ गई होती तो, वर्तमान में कौन क्या भूमिका तय कर रहा होता.
बड़े जोखिम हैं इस राह में
जिलों की कमान और मलाईदार विभाग… सरकार अफसरों की नजर इस पर गढ़ी ही रहती है. लेकिन नए मुख्यमंत्री के कामकाज और एक्शन के बाद अफसरों को ये राह जोखिमभरी महसूस हो रही है. कारण है अफसरों को निपुणता के साथ काम तो करना ही होगा, लेकिन कामकाज में सरलता होने के साथ उसका दिखना भी बेहद जरूरी है. ऐसा नहीं होने पर अफसरों पर गाज गिर सकती है. नई पोस्टिंग की तैयारी में जुटे अफसर इतना विचार जरूर कर रहे हैं कि बड़े जोखिम हैं इस राह में.
अब ठेकेदार के चक्कर लगा रहे बड़े-बड़े अफसर
सरकार नई हो या पुरानी। मौज तो अफसरों की ही होती है. लेकिन, कभी-कभी यह मौज भी भारी पड़ जाती है. ऐसा ही बीते दिनों पीडब्ल्यूडी के एक बड़े अफसर के साथ हुआ. राजधानी समेत इंदौर संभाग के बड़े प्रोजेक्ट को लेकर एक रसूखदार कंस्ट्रक्शन कंपनी के भुगतान को रोका गया था. कारण हर महकमे में व्याप्त शिष्टाचार से जुड़ा हुआ था. प्रदेश के रसूखदार ठेकेदार महोदय ने भी चुनाव का इंतजार किया. अंदाजा था कि जीत के बाद तो मंत्री बनेंगे. लेकिन, मंत्री से भी बड़ा पद मिला. फिर क्या था, एक फोन लगाया और बैक डेट में करोड़ों का काम चुटकियों में हो गया. जो बड़े अफसर अनसुनी कर रहे थे वे अब ठेकेदार के बंगले के बाहर आए दिन आमद दर्ज कराते नजर आते हैं.
अफसर की शह पर मंत्रालय में ऐसी खींचतान..
कहते हैं सरकार को मंत्रालय तो मंत्रालय को कर्मचारी चलाते हैं. लेकिन, इन दिनों मंत्रालय भी कर्मचारियों की सियासत का अड्डा बना हुआ है. हालात ऐसे है कि मानो सीज फायर. दरअसल, प्रदेश के सबसे बड़े ब्यूरोक्रेसी के केंद्र मंत्रालय में बीते दिनों पदभार ग्रहण करने आ रहे मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के सामने ही मंत्रालय के दो कर्मचारी संगठन आने-सामने हो गए. पहले कौन और स्वागत को लेकर दोनों ही गुटों में फसाद हुआ. खैर, वक्त रहते इसे सुलझा लिया गया. हालांकि इस खींचतान से प्रदेश के नए मुखिया भी खुश नहीं है. लेकिन, अंदर की बात तो यह है कि यह गुट भी पुरानी भवन के तीसरे माले के वीवीआईपी केबिन से संचालित हो रहे हैं. कर्मचारियों को शह देने का काम भी अफसरों का ही है.
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