कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 21 साल पुराने एक बेहद सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड (Double Murder Case) में अपना अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले के मुख्य दोषी मोहन लाल की अपील को खारिज करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। यह पूरा मामला किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जिसमें प्यार, धोखा और फिर बेहद शातिराना तरीके से मर्डर की साजिश रची गई थी।

क्या थी हत्या की वजह?

यह पूरी घटना 18-19 जनवरी 2003 की है। सिरसा के रहने वाले आरोपी मोहन लाल की शादी संतोष रानी से हुई थी, जबकि उसके दोस्त भजन लाल की शादी रमन से हुई थी। दोनों परिवारों का एक-दूसरे के घर आना-जाना था। इसी दौरान मोहन लाल को अपने दोस्त की पत्नी रमन से एकतरफा लगाव हो गया और वह उससे शादी करने के सपने देखने लगा।
इस चाहत को पूरा करने के लिए मोहन लाल ने रास्ते के दो बड़े कांटों—अपने दोस्त भजन लाल और खुद की पत्नी संतोष रानी—को हमेशा के लिए हटाने की खौफनाक साजिश रच डाली।

सुसाइड का नाटक और शवों का अंतिम संस्कार

घटना वाली रात जब भजन लाल घर नहीं लौटा, तो अगले दिन सुबह उसके परिजन जब मोहन लाल के घर पहुंचे। वहां मोहन लाल ने उन्हें एक मनगढ़ंत कहानी सुनाई। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी संतोष रानी का शव घर में और भजन लाल का शव उसकी दुकान में पड़ा है।

शातिर आरोपी ने परिजनों को विश्वास दिलाया कि दोनों ने जहर खाकर आत्महत्या की है। बदनामी के डर का वास्ता देकर उसने पुलिस को सूचना दिए बिना ही जल्दबाजी में दोनों शवों का अलग-अलग अंतिम संस्कार भी करवा दिया।

ऐसे खुला था ‘परफेक्ट मर्डर’ का राज

मोहन लाल को लगा था कि उसने बिना किसी सबूत के ‘परफेक्ट मर्डर’ को अंजाम दे दिया है, लेकिन कानून के हाथों से वह बच नहीं सका। इस अंधेरे केस को सुलझाने में तीन अहम कड़ियों ने मुख्य भूमिका निभाई:

  1. फर्जी चिट्ठी और लिखावट (Handwriting) की जांच: हत्या के कुछ दिनों बाद मोहन लाल ने मृतक भजन लाल के नाम से एक फर्जी पत्र लिखकर उसके परिवार को सौंपा। इस पत्र में भजन लाल की ओर से मोहन लाल और रमन की शादी कराने की इच्छा जताई गई थी। जब फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) ने इस पत्र की हैंडराइटिंग जांच की, तो पता चला कि यह लिखावट किसी और की नहीं बल्कि खुद आरोपी मोहन लाल की थी।
  2. इंसुलिन और सिरिंज की बरामदगी: पुलिस जांच के दौरान आरोपी मोहन लाल की निशानदेही पर घटना में इस्तेमाल की गई इंसुलिन की शीशी और सिरिंज बरामद की गई। FSL की रिपोर्ट में भी शीशी के अंदर इंसुलिन होने की पुष्टि हुई, जिससे साफ हो गया कि दोनों को इंसुलिन का ओवरडोज देकर मारा गया था।

हाई कोर्ट की मुहर

सिरसा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 27 सितंबर 2005 को ही मोहन लाल को हत्या (IPC की धारा 302) और सबूत मिटाने (धारा 201) का दोषी मानते हुए उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
इसी फैसले के खिलाफ दोषी ने हाई कोर्ट में अपील की थी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की बेंच ने कहा कि “परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) की कड़ियां मिलकर पूरी श्रृंखला बनाती हैं।” अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बिल्कुल सही ठहराते हुए दोषी की अपील को सिरे से खारिज कर दिया।