Rajasthan Nikay Chunav 2026 के नतीजों के बाद कांग्रेस में अब सिर्फ हार-जीत के आंकड़ों की चर्चा नहीं है। पार्टी के भीतर चुनावी रणनीति, बड़े नेताओं की भूमिका और चुनाव के बाद पार्षदों को साथ रखने के सियासी मैनेजमेंट पर भी सवाल उठ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खुद कहा है कि कांग्रेस को चुनाव अभियान की रणनीति का विश्लेषण करना चाहिए। उनका कहना है कि अगर मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेता आक्रामक प्रचार कर रहे थे तो कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी एक साथ मैदान में उतरना चाहिए था।

गहलोत के इस बयान ने राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया है। खास तौर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की चुनावी रणनीति को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। दूसरी ओर, बीजेपी की तरफ से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रचार के आखिरी दौर में लगातार रोड शो किए और कई संभागों का दौरा किया।
गहलोत ने रणनीति पर उठाए सवाल
अशोक गहलोत ने कहा कि कांग्रेस को भी मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेताओं के आक्रामक प्रचार का जवाब देना चाहिए था। उनके मुताबिक प्रदेश कांग्रेस कमेटी को साझा कार्यक्रम बनाना चाहिए था। सभी बड़े नेता एक साथ निकलते, रोड शो और साझा अभियान होता तो नतीजे बेहतर हो सकते थे।
गहलोत ने निर्दलीय प्रत्याशियों के प्रदर्शन को भी कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बताया। उनका सवाल था कि अगर सरकार के खिलाफ नाराजगी थी तो निर्दलीयों को कांग्रेस से ज्यादा वोट क्यों मिले। उन्होंने पार्टी से बैठकर पूरे चुनाव का विश्लेषण करने की जरूरत बताई।
बीजेपी ने संभाली साझा कमान
निकाय चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने खुद मोर्चा संभाला। 4 सितंबर से शुरू हुए उनके रोड शो भीलवाड़ा और उदयपुर से लेकर जोधपुर, भरतपुर, बीकानेर, अजमेर और जयपुर तक पहुंचे। चुनाव प्रचार के अंतिम दिन जयपुर में भी मुख्यमंत्री ने मेगा रोड शो किया।
इसके मुकाबले कांग्रेस के बड़े नेताओं की सक्रियता अलग-अलग क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई दी। गहलोत का फोकस जोधपुर और मारवाड़ क्षेत्र पर रहा। डोटासरा ने सीकर-शेखावाटी में संगठन के साथ मोर्चा संभाला। टीकाराम जूली अलवर और आसपास सक्रिय रहे। सचिन पायलट के प्रभाव वाले टोंक में कांग्रेस बोर्ड बनाने में कामयाब रही।
हालांकि पूरे प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेताओं का एक साझा अभियान उस स्तर पर नहीं दिखा, जिसकी अब गहलोत खुद बात कर रहे हैं। यही अंतर चुनाव के बाद पार्टी की रणनीति को लेकर चर्चा का आधार बन गया है।
गहलोत-डोटासरा की खींचतान फिर चर्चा में
गहलोत के बयान के बाद प्रदेश कांग्रेस के भीतर उनकी और गोविंद सिंह डोटासरा की राजनीतिक खींचतान भी फिर चर्चा में है। निकाय चुनाव के दौरान डोटासरा ने बागियों को पार्टी लाइन के खिलाफ चुनाव लड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी थी। उन्होंने उस समय कहा था कि सभी नेताओं ने मिलकर चुनाव में काम किया है।
चुनाव के बाद गहलोत ने निकायों में बोर्ड गठन को लेकर बीजेपी पर दबाव बनाने के आरोप भी लगाए। इस पर प्रदेश कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल से उनकी पोस्ट को लेकर प्रतिक्रिया दी गई थी। बाद में वह पोस्ट हटा दी गई। इस घटनाक्रम ने दोनों नेताओं के बीच मतभेद की चर्चा को फिर हवा दी।
कई निकायों में निर्दलीय बने निर्णायक
निकाय चुनाव के बाद कई जगह बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा। ऐसे निकायों में निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन के लिए अहम हो गए। इसके बाद दोनों दलों की ओर से पार्षदों को अपने साथ रखने की कोशिशें तेज हुईं।
जोधपुर में पार्षदों की संख्या बराबर रहने के बाद पुनर्मतदान हुआ। इसके बाद कुछ सीटों का गणित बदला और निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। बीकानेर में कांग्रेस के पास बहुमत का आंकड़ा होने के बावजूद पार्टी के भीतर असंतोष और परिवारवाद को लेकर सवाल उठे हैं।
2028 से पहले कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस के सामने अब संगठन और रणनीति को लेकर सवाल हैं। गहलोत के बयान ने इन्हें खुलकर सामने ला दिया है। चुनाव में अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहने के बजाय क्या पार्टी के बड़े नेता एक साझा अभियान के साथ मैदान में उतर सकते हैं, यह सवाल अब कांग्रेस के भीतर चर्चा में है।
2028 के विधानसभा चुनाव से पहले निकाय चुनाव का अनुभव कांग्रेस के लिए संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल पार्टी के सामने चुनौती चुनावी हार-जीत से आगे बढ़कर अपने नेताओं और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने की है।
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