उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाओं को लेकर आज जो विधि सम्मत, समदर्शी व पारदर्शी व्यवस्था है, वर्ष 2017 के पहले उसका क्या हाल था ये हर किसी से छिपा नहीं है. पुलिस भर्ती लंबे समय तक सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि यह सत्ता, सिफारिश और सामाजिक समीकरणों की राजनीति का प्रतीक बन गई थी. समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान, पुलिस भर्ती को लेकर उठे सवाल केवल आरोप मात्र नहीं थे, बल्कि जांच, अदालत और प्रशासनिक टकराव की आंच में सुलगते ज्वलंत विषय रहे. इसकी आंच ऐसी उठी कि “पर्ची और खर्ची” जैसे शब्द आम बोलचाल की भाषा में व्यवस्था की पहचान बन गए. उस दौर में, अनियमितता, अराजकता, कुप्रबंधन, कुशासन के केन्द्र में समाजवाद की चादर ओढ़े सियासी कद्दावरों की मनमर्जी ने न केवल सुर्खियां बटोरीं बल्कि उनके कारनामे उत्तर प्रदेश के काले अध्याय के तौर पर याद किए जाते हैं. वर्तमान योगी सरकार की कार्यप्रणाली न केवल इस काले अध्याय से प्रदेश को बाहर लाने में सक्षम रही, बल्कि उज्जवल भविष्य वाले उन्नत उत्तर प्रदेश की नींव रख रही है, जो सपा के कार्यकाल को देखते हुए असंभव सा जान पड़ता है.
सिपाही से लेकर दरोगा तक की भर्तियों में अनियमितताएं
वर्ष 2003-2007 की सपा सरकार के दौरान प्रदेश में सिपाही और दरोगा भर्तियों में अनियमितताओं के आरोप सामने आए. चयन सूचियों में ऐसे अभ्यर्थियों के नाम पाए गए जिनकी योग्यता और शारीरिक मानक संदिग्ध बताए गए. आरोप लगे कि लिखित परीक्षा और इंटरव्यू में अंकों के साथ छेड़छाड़ की गई. इसी समय कुछ वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने यह बात बाकायदा रिकॉर्ड पर रखीं कि भर्ती बोर्ड पर राजनीतिक दबाव काम कर रहा है. धीरे-धीरे यह धारणा बनी कि जाति विशेष के अभ्यर्थियों को ही वरीयता दी जा रही है. प्रशासनिक हलकों में इसे “यादवाइजेशन” कहा गया, यानी जाति विशेष को प्राथमिकता, जिससे बाकी वर्गों के अभ्यर्थियों में असंतोष गहराया.
अखिलेश यादव के कार्यकाल में विवादों का विस्तार
वर्ष 2012 में सत्ता संभालने के बाद अखिलेश यादव ने युवा और आधुनिक शासन की बात कही, लेकिन पुलिस से लेकर तमाम भर्ती विवाद थमे नहीं. 2014-15 की भर्तियों में नियमों में बार बार बदलाव, कटऑफ अंकों में संशोधन और चयन सूची बदलने के आरोप लगे. कई अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि आरक्षण नियमों के साथ घालमेल कर कुछ उम्मीदवारों को दोहरा लाभ दिया गया. ओबीसी वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में दिखाकर चयनित करने और योग्य उम्मीदवारों को बाहर रखने की शिकायतें सामने आईं. इससे नाराज युवाओं ने प्रदर्शन किए और मामले अदालत तक पहुंचे. भर्ती विवाद उस समय और गंभीर हो गया जब कई आईपीएस अधिकारियों ने खुलकर प्रक्रिया पर सवाल उठाए. सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी शैलजा कांत मिश्रा ने भी गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा किया था. इसके बाद विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित हुई. एसआईटी की जांच में फर्जी दस्तावेज, अंकों में हेरफेर और सिफारिश के आधार पर नाम जोड़ने जैसे तथ्य सामने आए. सपा के बड़े नेताओं पर भी आरोप लगे कि जांच कर रहे अधिकारियों पर दबाव डाला गया, हालांकि उन्होंने इन आरोपों को राजनीतिक बताया. मगर सच क्या था ये सभी को पता है.
सत्ता परिवर्तन से सुशासन तक, वर्ष 2017 से प्रगति पथ पर प्रदेश
वर्ष 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पुलिस भर्ती प्रणाली को पूरी तरह बदलने का दावा किया. परीक्षा प्रक्रिया में तकनीक का उपयोग, बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और केंद्रीकृत मेरिट लिस्ट लागू की गई. इन सुधारों से “पर्ची और खर्ची” की प्रथा पर रोक लगी. अब न तो पैसे के दम पर और न ही जाति या धर्म के आधार पर चयन संभव है. भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह योग्यता आधारित बनाया गया, जिससे प्रदेश के लाखों अभ्यर्थियों को निष्पक्ष अवसर मिला. एक ओर, पूर्ववर्ती सपा सरकार और अखिलेश यादव के कार्यकाल में पुलिस समेत तमाम भर्तियों में पारदर्शिता के अभाव ने युवाओं का भरोसा तोड़ा. इसके विपरीत योगी आदित्यनाथ सरकार ने उन कुरीतियों को खत्म किया, जो वर्षों से व्यवस्था में जड़ जमा चुकी थीं. पर्ची और खर्ची की संस्कृति को समाप्त कर, पूरी पारदर्शिता के साथ नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा किया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि प्रदेश के अभ्यर्थियों को पहली बार यह भरोसा मिला कि चयन योग्यता के आधार पर होगा, न कि जाति, धर्म, सिफारिश या पैसे के दम पर. यही बदलाव आज यूपी की भर्ती व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान बनकर सामने आया है.
पौने नौ वर्षों में 9 लाख नौकरियां
उत्तर प्रदेश के अंदर सुरक्षा सुशासन का बेहतरीन माहौल हो इसके लिए विगत 8 वर्षों में 2 लाख 19 हजार पुलिस कार्मिकों की भर्ती की गई है,आज पुलिस बल में 44 हजार से अधिक महिला कार्मिक अपना योगदान दे रही हैं। पौने नौ साल में लगभग 9 लाख सरकारी नौकरियां दी गई हैं.
-भावेष पाण्डेय (अधिवक्ता)
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