कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की लीगल हेड रत्ना सिंह (Ratna Singh) की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दिल्ली की एक अदालत के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मिल गई है। मामला सोशल मीडिया पर की गई उस पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें दिल्ली की एक अदालत के न्यायिक अधिकारी को लेकर टिप्पणी की गई थी। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता (आपराधिक) अमोल सिन्हा ने इस मामले में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए उचित कदम उठाने पर सहमति जताई है।

CJM के आदेश पर पोस्ट से शुरू हुआ विवाद

यह पूरा मामला रत्ना सिंह की एक्स पर की गई उन पोस्ट से जुड़ा है, जिनमें उन्होंने साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अभिनव पांडे के एक आदेश पर असंतोष जताया था। शिकायत के मुताबिक, रत्ना सिंह ने अपनी एक पोस्ट में आरोप लगाया था कि न्यायिक अधिकारी किसी ‘मालिक की सेवा’ कर रहे हैं। इस टिप्पणी को लेकर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग उठी है। मामले में अमोल सिन्हा की सहमति को आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, केवल सहमति मिलने का मतलब यह नहीं है कि रत्ना सिंह के खिलाफ अवमानना साबित हो गई है।

14 अक्टूबर को की गई थी कार्रवाई की मांग

रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग अधिवक्ता कौशिक चटर्जी ने की थी। उन्होंने 14 अक्टूबर को इस संबंध में पत्र भेजा था। इसके बाद 28 अक्टूबर को एक पूरक प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया गया। इन शिकायतों पर विचार करने के बाद अमोल सिन्हा ने 2 नवंबर को लिखे पत्र में अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 15(2) के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए उचित कदम उठाने पर सहमति दी।

सोशल मीडिया पोस्ट में न्यायिक स्वतंत्रता पर उठाए गए थे सवाल

अमोल सिन्हा के मुताबिक, रत्ना सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट केवल न्यायिक आदेश की आलोचना तक सीमित नहीं थीं। प्रथम दृष्टया इन पोस्ट से यह संकेत मिलता था कि संबंधित मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने के बजाय किसी बाहरी प्राधिकारी के निर्देश पर काम कर रहे थे। शिकायत के अनुसार, रत्ना सिंह ने एक पोस्ट में आरोप लगाया था कि न्यायिक अधिकारी किसी ‘मालिक की सेवा’ कर रहे हैं। यह टिप्पणी साकेत कोर्ट के CJM अभिनव पांडे के एक आदेश पर असंतोष जताते हुए की गई थी।

न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल का मामला

अमोल सिन्हा ने कहा कि रत्ना सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट केवल न्यायिक आदेश की आलोचना तक सीमित नहीं थीं। प्रथम दृष्टया इनमें यह संकेत मिलता था कि संबंधित मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने के बजाय किसी बाहरी प्राधिकारी के निर्देश पर काम कर रहे हैं। सिन्हा के मुताबिक, इस तरह की टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती हैं। इससे अदालत के अधिकार और न्याय व्यवस्था में आम लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंच सकता है। इसी आधार पर उन्होंने आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी।

पुलिस और मजिस्ट्रेट प्रणाली पर बयानों का भी लिया संज्ञान

अमोल सिन्हा ने दिल्ली पुलिस और विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट प्रणाली के कामकाज को लेकर रत्ना सिंह के बाद के बयानों पर भी विचार किया। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारियों या किसी व्यवस्था की कड़ी आलोचना मात्र को आपराधिक अवमानना नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी राय शुरुआती आरोपों की प्रकृति तक सीमित है। इसे आपराधिक अवमानना का अंतिम निर्धारण नहीं समझा जाना चाहिए।

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