Tata Group Dispute: एन चंद्रशेखरन (N Chandrasekaran) ही टाटा संस (Tata Sons) के बॉस (चेयरमेन) बने रहेंगे। टाटा संस ने टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) के प्रमुख नोएल टाटा (Noel Tata) की आपत्तियों को खारिज कर दिया है, जिसमें एन. चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाने का विरोध हुआ था। कंपनी ने इसे कानूनी रूप से पूरी तरह सही माना है। कंपनी ने 24 सितंबर को नोएल टाटा को भेजे पत्र में कहा कि 17 सितंबर को निदेशक मंडल ने लागू कानून और कंपनी के Articles of Association के तहत बहुमत से चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का फैसला किया था। टाटा संस ने अपने फैसले के समर्थन में तीन कानूनी राय का भी हवाला दिया है।
बता दें कि टाटा ग्रुप के अंदर चेयरमैन पद को लेकर खींचतान अब खुलकर सामने आती दिख रही है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। जबकि टाटा संस ने इसे नियमों और कानून के मुताबिक लिया गया फैसला बताया है।
टाटा संस ने 24 सितंबर को नोएल टाटा को एक चिट्ठी लिखी। कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय की तरफ से लिखी गई इस चिट्ठी में बताया गया कि ये कदम पूरी तरह से कानूनी है। इसमें कंपनी ने साफ कहा कि आर्टिकल 118 सिर्फ किसी नए चेयरमैन की पहली नियुक्ति पर लागू होता है। ये नियम किसी मौजूदा चेयरमैन की दोबारा ताजपोशी पर लागू नहीं होता। बोर्ड ने बहुमत से चंद्रशेखरन को दोबारा जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है। इसके लिए टाटा संस ने देश के दिग्गज कानूनी विशेषज्ञों की राय भी ली। शुरुआत में वरिष्ठ वकील सुदीप्तो सरकार की राय ली गई थी। जब नोएल टाटा ने सवाल उठाए, तो कंपनी ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित के साथ पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बीएन श्रीकृष्ण से भी संपर्क किया। इन सभी दिग्गजों ने माना कि बोर्ड का प्रस्ताव एकदम सही है। टाटा संस ने टाटा ट्रस्ट्स को आरबीआई के साथ हुए पत्राचार से जुड़े 600 पेज के दस्तावेज भी उपलब्ध कराए।
इस चिट्ठी में 18 अगस्त को बुलाई गई सालाना आम बैठक (AGM) का भी जिक्र है। ये बैठक कोरम पूरा न होने के कारण टालनी पड़ी थी। टाटा संस ने स्पष्ट किया कि बैठक इसलिए टली क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स आर्टिकल 86 के तहत अपना कोई संयुक्त प्रतिनिधि नामित नहीं कर पाए थे। कंपनी ने 17 सितंबर के बोर्ड प्रस्ताव को एजीएम टलने से जोड़ने की किसी भी कोशिश को गलत बताया। अब चंद्रशेखरन के डायरेक्टर पद पर बने रहने के लिए कंपनी अधिनियम की धारा 152 के तहत एक नई बैठक बुलाई जाएगी।
नोएल टाटा की आपत्तियों का आधार
नोएल टाटा का कहना था कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति में नियमों का पालन नहीं हुआ है। उन्होंने कंपनी के आर्टिकल 118 का हवाला दिया था। इस नियम के तहत, अगर टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 40 फीसदी हिस्सेदारी है, तो चेयरमैन चुनने के लिए एक खास प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसमें सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट, सर रतन टाटा ट्रस्ट के प्रतिनिधियों वाली एक चयन समिति चेयरमैन का चुनाव करती है। नोएल का तर्क था कि इसी प्रक्रिया से दोबारा नियुक्ति भी होनी चाहिए।
जानिए विवाद की असली वजह
टाटा ग्रुप में उथल-पुथल की वजह बोर्ड नियुक्तियां, इंफोर्मेशन तक एक्सेस और टाटा संस की लंबे समय से लटकी लिस्टिंग योजना है। इसी को लेकर ट्रस्टियों के बीच अंदरूनी कलह सामने आ रही है। स्थिति ये है कि ग्रुप दो खेमों में बंट गया है। टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के नियमों के अनुसार चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव वैध होने के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामांकित दोनों निदेशकों की मौजूदगी और दोनों की सहमति अनिवार्य है। 17 सितंबर 2026 को हुई बोर्ड बैठक में यह प्रस्ताव चार निदेशकों के पक्ष में मतदान और नोएल टाटा के विरोध के बाद पास किया गया था। मौजूदा बोर्ड में ट्रस्ट के सिर्फ दो नॉमिनी हैं- नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन। इन दोनों ने गुरुवार को अलग-अलग दिशा में वोट किया। नोएल ने खिलाफ वोट किया, जबकि वेणु ने समर्थन किया। जब मामला टाई होने की नौबत पर आया, तो मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे हरीश मनवानी ने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया।

विवाद के पीछे आरबीआई का एक बड़ा फैसला भी
इसे पूरे विवाद के पीछे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) का एक बड़ा फैसला भी है। आरबीआई द्वारा 11 सितंबर को टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी पंजीकरण सरेंडर करने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद यह विवाद उपजा है।हाल ही में आरबीआई ने टाटा संस की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें कंपनी ने प्राइवेट बने रहने की मांग की थी। नियम के मुताबिक एक तय साइज के शैडो बैंकों को शेयर बाजार में लिस्ट होना जरूरी है। टाटा संस का बोर्ड आरबीआई की गाइडलाइंस का पालन करते हुए लिस्टिंग की तरफ कदम बढ़ाना चाहता है। नोएल टाटा का नजरिया इस पर बिल्कुल अलग है। उनका मानना है कि कंपनी को लिस्ट कराने की कोई मजबूरी नहीं है। उनका सुझाव है कि आरबीआई के नियमों का पालन करने के लिए कुछ अन्य स्ट्रक्चरल विकल्प तलाशे जा सकते हैं, जिससे टाटा संस को प्राइवेट रखा जा सके।
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