अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में रसोई गैस सिलेंडरों से गैस चोरी और हेराफेरी का मामला सामने आया है, जिसके बाद गैस वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर के बाहर सुनसान मैदान में सिलेंडरों से भरी मालवाहक गाड़ी के पास गैस की हेराफेरी से जुड़ी गतिविधियां सामने आईं। स्थानीय लोगों की सूचना पर एसडीएम और फूड इंस्पेक्टर मौके पर पहुंचे। प्रशासन ने जांच के बाद मालवाहक गाड़ी को गैस एजेंसी पहुंचाया और पंचनामा कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान मौके पर मौजूद चार लोग फरार हो गए।
जानिए पूरा मामला
दरअसल, यह मामला इंडेन कंपनी की प्रॉमिनेंट फ्यूल सेंटर डोंगरगढ़ से जुड़ा है। लंबे समय से उपभोक्ताओं द्वारा सिलेंडरों में कम गैस मिलने की शिकायतें किए जाने के बीच इस घटना ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। जानकारी के मुताबिक, शहर से बाहर आदर्श नगर और भूरवा टोला के बीच सुनसान मैदान में सिलेंडरों से लदी गाड़ी के आसपास कुछ लोग मौजूद थे। स्थानीय लोगों ने उनसे पूछताछ की, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद प्रशासन को सूचना दी गई। इसके बाद मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने जांच की और वाहन को एजेंसी ले जाकर पंचनामा तैयार कराया।

खड़े हुए कई सवाल
इस पूरी कार्रवाई में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सिलेंडरों का वजन कराया गया या नहीं, गैस की मात्रा में कमी की पुष्टि हुई या नहीं और मौके से हेराफेरी में इस्तेमाल होने वाली कोई सामग्री बरामद हुई या नहीं। इन बिंदुओं का आधिकारिक विवरण सामने आने से मामले की गंभीरता और जिम्मेदारों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी। इस मामले में संदेह के घेरे में आए लोग गैस एजेंसी में सिलेंडर वितरण का काम करते थे।
बताया जा रहा है कि उन्हें करीब तीन महीने पहले काम पर रखा गया था और वे राजस्थान के रहने वाले हैं। यह भी जानकारी सामने आई है कि एजेंसी के जिम्मेदारों को इन श्रमिकों के नाम तक की जानकारी नहीं थी। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो कर्मचारियों के सत्यापन, नियुक्ति प्रक्रिया और सिलेंडरों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठेंगे। आखिर जिन लोगों के हाथों में उपभोक्ताओं तक गैस पहुंचाने की जिम्मेदारी थी, उनके कामकाज पर निगरानी किसकी थी ? मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि उपभोक्ता लंबे समय से सिलेंडरों में कम गैस मिलने की शिकायत कर रहे थे।
शिकायत करने पर उपभोक्ताओं से ही सबूत लाने को कहे जाने की बात भी सामने आई है। अब जांच में यह पता लगाना जरूरी है कि शिकायतों का पहले क्या हुआ, वितरण के लिए निकले सिलेंडरों का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाता था और क्या किसी स्तर पर गैस की मात्रा की नियमित जांच होती थी। यदि पहले शिकायतें मिली थीं, तो उनकी जांच और कार्रवाई का रिकॉर्ड भी सामने आना चाहिए।

रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की जांच जरूरी
LPG की आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने वाले नियमों में अवैध तरीके से गैस निकालने या एक सिलेंडर से दूसरे सिलेंडर में गैस स्थानांतरित करने पर रोक है। LPG (Regulation of Supply and Distribution) Order, 2000 के खंड 4(1)(a) के तहत निर्धारित अनुमति के बिना गैस का ऐसा स्थानांतरण प्रतिबंधित है। वहीं, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत संबंधित नियंत्रण आदेश के उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। यदि जांच में गैस चोरी, अवैध स्थानांतरण या अन्य उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित लोगों की भूमिका के अनुसार कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए इस मामले में केवल पंचनामा ही नहीं, बल्कि वजन, स्टॉक रजिस्टर, वितरण रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की जांच भी जरूरी है।
गैस एजेंसी के मालिक ने कही FIR की बात
उधर, गैस एजेंसी के मालिक विवेक वासनिक ने संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही है, लेकिन उपभोक्ताओं के लिए यह जानना भी जरूरी है कि एफआईआर दर्ज हुई या नहीं, चार फरार लोगों की पहचान और तलाश के लिए क्या कदम उठाए गए और जांच किस दिशा में आगे बढ़ रही है।

फूड इंस्पेक्टर ने कही उच्च अधिकारियों से संपर्क करने की बात
एजेंसी प्रबंधन की जिम्मेदारी और संभावित भूमिका भी तथ्यों के आधार पर जांच के दायरे में स्पष्ट होनी चाहिए। इस पूरे मामले में प्रशासन की जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है। एसडीएम और फूड इंस्पेक्टर मौके पर पहुंचे, कार्रवाई हुई और पंचनामा तैयार किया गया, लेकिन जब फूड इंस्पेक्टर से कैमरे पर आधिकारिक पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने बयान देने से इनकार करते हुए उच्च अधिकारियों से संपर्क करने की बात कही।
सवाल यह है कि जब मामला आम उपभोक्ताओं की जेब और उनके अधिकारों से जुड़ा है, तो कार्रवाई करने वाला विभाग जांच की स्थिति स्पष्ट करने से क्यों बच रहा है ? यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है, तो सिलेंडरों की जांच, वजन और आगे की कार्रवाई की जानकारी देने में परेशानी क्या है ? यह सही है कि जांच के दौरान हर तथ्य तत्काल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, लेकिन जांच की गोपनीयता के नाम पर उपभोक्ताओं के सवालों को अनिश्चितकाल तक टाला भी नहीं जा सकता।

एसडीएम और खाद्य विभाग को कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने सिलेंडरों की जांच हुई, गैस की कमी की पुष्टि हुई या नहीं, कौन-से दस्तावेज जब्त किए गए और कानूनी कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है। कैमरे पर बयान न देना किसी अधिकारी की गलती का प्रमाण नहीं, लेकिन गंभीर जनहित के मामले में स्पष्ट जानकारी का अभाव प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल जरूर खड़े करता है।
फिलहाल, डोंगरगढ़ के इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या उपभोक्ताओं को लंबे समय से कम गैस मिल रही थी और क्या वितरण व्यवस्था के भीतर ही गैस की हेराफेरी हो रही थी ? चार लोगों के फरार होने की जानकारी, पुरानी शिकायतें और प्रशासनिक कार्रवाई इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग करती हैं। अब देखना होगा कि जांच में सामने आए साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय होती है या मामला पंचनामा और एफआईआर के आश्वासन तक सीमित रह जाता है।
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