सत्या राजपूत, रायपुर। कभी जिस कोर्स के लिए हजारों-लाखों आवेदन आते थे, आज उसी कोर्स की सीटें खाली पड़ी हैं. छत्तीसगढ़ में फार्मेसी शिक्षा का हाल देखकर शिक्षा जगत में चिंता बढ़ गई है. बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी.फार्म) में कुल 4000 सीटें हैं, जिनमें से 2200 सीटें खाली हैं. डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी.फार्म) में कुल 8000 सीटें हैं, जिनमें से करीब 3800 सीटें अभी भी खाली पड़ी हैं. खाली सीटों को देखते हुए संस्थागत चरण (इंस्टीट्यूशनल राउंड) को मंजूरी दी गई है. प्रवेश की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर तय की गई है.
फार्मेसी एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने कहा, उच्च शिक्षा में लगातार विद्यार्थियों की संख्या कम होती जा रही है. आखिरकार ऐसे महत्वपूर्ण कोर्स में सीटें खाली हो रही हैं. कहीं न कहीं पढ़ाई के बाद नौकरी की उपलब्धता न होना और प्रवेश के नियम-कानून कठिन होना प्रमुख कारण हैं. सरकार को इस पर गंभीर मंथन करने की जरूरत है, ताकि युवा सही रास्ते पर रहें. बेरोजगार युवा खतरनाक हो सकते हैं, उन्हें रोकना मुश्किल होगा.

फार्मेसी कोर्स का महत्व और वर्तमान भूमिका
फार्मेसी केवल दवा बेचने का काम नहीं है. यह स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है. डॉक्टर दवा लिखते हैं, लेकिन सही दवा तैयार करना, उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना, साइड इफेक्ट्स की जानकारी देना और मरीज को सही सलाह देना फार्मासिस्ट का काम है. अस्पतालों, फार्मास्यूटिकल कंपनियों, रिसर्च लैब, ड्रग कंट्रोल विभाग, क्लिनिकल रिसर्च और यहां तक कि आयुष क्षेत्र में भी फार्मासिस्ट की भूमिका बढ़ती जा रही है. कोविड काल में दवाओं की आपूर्ति और वैक्सीन प्रबंधन में इनकी भूमिका सबके सामने आई थी.
वर्तमान समय में नई दवाओं का विकास
जेनेरिक दवाओं का प्रसार, डिजिटल हेल्थ और फार्माकोविजिलेंस जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित फार्मासिस्ट की मांग सैद्धांतिक रूप से बनी हुई है. फिर भी मैदान में स्थिति अलग है.
नौकरी का संकट और कम वेतन
असली समस्या पढ़ाई पूरी होने के बाद शुरू होती है. सरकारी नौकरियों की संख्या बहुत कम है. ज्यादातर युवा प्राइवेट सेक्टर या खुद की मेडिकल स्टोर पर निर्भर रहते हैं. प्राइवेट फार्मेसी स्टोर पर शुरुआती वेतन अक्सर 8,000 से 15,000 रुपये प्रति माह तक सीमित रहता है. लंबे घंटे, दबाव और भविष्य की अनिश्चितता युवाओं को इस क्षेत्र से दूर कर रही है. कई कंपनियों में भी अनुभव की मांग और कम पैकेज युवाओं को निराश करते हैं. नतीजा कोर्स पूरा करने के बाद भी बेरोजगारी या दूसरे क्षेत्रों की ओर रुख
खाली सीटों के नुकसान
खाली सीटों का मतलब सिर्फ संख्या नहीं है. संस्थानों का आर्थिक नुकसान, शिक्षकों का भविष्य प्रभावित होना और सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी है. अगर योग्य फार्मासिस्ट नहीं होंगे तो दवाओं की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और फार्मा उद्योग की प्रगति पर असर पड़ेगा. साथ ही शिक्षा क्षेत्र में निवेश का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है..
सरकार को उठाने चाहिए ये कदम?
विशेषज्ञों और एसोसिएशन का मानना है कि सरकार को बहुआयामी रणनीति अपनानी चाहिए. रोजगार सृजन करते हुए सरकारी अस्पतालों, पीएचसी और सीएचसी में फार्मासिस्ट पदों की संख्या बढ़ाना चाहिए. ड्रग इंस्पेक्टर और अन्य नियामक पदों की नियमित भर्ती सुनिश्चित करना होगा. प्रवेश प्रक्रिया सरल बनाते अनावश्यक जटिल नियमों को सरल करना, ताकि योग्य छात्र आसानी से प्रवेश ले सकें. स्किल डेवलपमेंट और इंडस्ट्री लिंकेज कर कोर्स में व्यावहारिक प्रशिक्षण बढ़ाया जाए. फार्मा कंपनियों के साथ इंटर्नशिप और प्लेसमेंट की व्यवस्था मजबूत की जाए. वेतन और सम्मान के लिए न्यूनतम वेतन मानक तय करना और फार्मासिस्ट को स्वास्थ्य टीम का सम्मानित सदस्य माना जाए. जागरूकता अभियान चलाते हुए स्कूल स्तर से ही फार्मेसी के करियर संभावनाओं के बारे में सही जानकारी दी जाए. स्टार्टअप और स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए मेडिकल स्टोर खोलने, ऑनलाइन फार्मेसी या फार्मा संबंधित छोटे उद्यमों के लिए आसान ऋण और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना.
राजीव गुप्ता का इशारा सही है अगर युवा बेरोजगार रहेंगे तो वे गलत रास्ते पर जा सकते हैं. शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटना सिर्फ एक विभाग का काम नहीं, बल्कि समग्र नीति का विषय है. फार्मेसी जैसे महत्वपूर्ण कोर्स को बचाना स्वास्थ्य सुरक्षा और युवा शक्ति दोनों के लिए जरूरी है. 30 अक्टूबर तक चल रहे संस्थागत चरण में सीटें भरने की कोशिश तो हो रही है, लेकिन असल समाधान दीर्घकालिक नीति में छिपा है. सरकार अगर समय रहते मंथन करे तो स्थिति बदली जा सकती है. नहीं तो खाली सीटें सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी बन जाएगी.
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