देहरादून. 2 चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज कराई है. जिसे लेकर हरीश रावत का बड़ा बयान सामने आया है. उन्होंने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है. पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित रूप से चुनाव आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की. ये आपत्तियां किसी मामूली प्रशासनिक विषय पर नहीं, बल्कि नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने और पूरी Electoral Roll की IT प्रणाली से जुड़ी हैं.

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हरीश रावत ने कहा सबसे गंभीर बात यह है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए आपत्ति दर्ज की और आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण फैसलों में उन्हें जानकारी या सहमति से बाहर रखा गया. Form-6 में बदलाव को लेकर भी दोनों आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी. चुनाव आयोग किसी एक व्यक्ति की निजी संस्था नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत यह एक संस्थागत व्यवस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दोनों चुनाव आयुक्त इसकी सामूहिक जिम्मेदारी निभाते हैं. 2023 के कानून में भी आयोग के कामकाज के संबंध में सामूहिक निर्णय की व्यवस्था है.

उन्होंने ये भी कहा कि ऐसे में सवाल बिल्कुल सीधा है कि अगर दो चुनाव आयुक्त लगातार लिखित आपत्तियां दर्ज कर रहे हैं, तो इन गंभीर आपत्तियों का जवाब कौन देगा? मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा विषय है. इसकी प्रक्रिया में पारदर्शिता, कानून का पालन और संस्थागत जवाबदेही से कोई समझौता नहीं हो सकता.

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हरीश रावत ने ये भी कहा कि ज्ञानेश कुमार को इन गंभीर आरोपों और आपत्तियों पर देश के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए. और यदि चुनाव आयोग की संवैधानिक गरिमा, निष्पक्षता और संस्थागत विश्वास पर ही गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो CEC के पद पर उनके बने रहने को लेकर भी सार्वजनिक और संवैधानिक स्तर पर गंभीर समीक्षा होनी चाहिए. चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की बपौती नहीं, यह भारत के लोकतंत्र की संवैधानिक संस्था है. लोकतंत्र में सबसे ऊपर सत्ता नहीं, जनता का मत और उसका अधिकार है.