मयंक श्रीवास्तव, अयोध्या. सूबे के डिप्टी सीएम औऱ स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक भले ही सरकारी अस्पतालों में मुफ्त और बेहतर इलाज का दावा करते हों, लेकिन अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज दर्शननगर की हकीकत उनके दावों को मुंह चिढ़ा रही है. आरोप है कि यहां एक गरीब बुजुर्ग को सिर्फ इसलिए ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे से लौटा दिया गया, क्योंकि उसके बेटे ने स्टाफ के कहने पर बाहर की दुकान से महंगा सामान लाने से इंकार कर दिया था.

मामला दर्शननगर मेडिकल कॉलेज का है. पीड़ित विनोद कुमार पिछले एक महीने से अपने पिता का हर्निया का ऑपरेशन कराने के लिए अस्पताल के चक्कर लगा रहे हैं. आरोप है कि इलाज करने वाले डॉक्टर तारीख पर तारीख देते रहे और हर बार बाहर से लगभग 900 रुपये की प्राइवेट जांच लिख दी. मजदूरी कर परिवार पालने वाले विनोद ने कर्ज लेकर किसी तरह जांचें कराईं. इसके बाद 3 नवंबर को ऑपरेशन की तारीख पक्की हुई. पिता को ऑपरेशन थियेटर में ले जाने की तैयारी चल रही थी. परिजनों ने राहत की सांस ली ही थी कि तभी डॉक्टर प्रदीप कुमार सिंह के कथित कंपाउंडर ने खेल बिगाड़ दिया.

इसे भी पढ़ें- चोरी के बिना चुनाव नहीं जीत सकती BJP! संविधान विरोधी बताते हुए अखिलेश यादव ने सरकार को घेरा, जानिए और क्या कहा?

आरोप है कि कंपाउंडर ने एक सादी पर्ची पर दवाएं और ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाला सामान लिखकर विनोद को थमाया और सीधे आरके मेडिकल स्टोर से ही लाने का फरमान सुनाया. जब विनोद ने हिम्मत करके पूछा कि क्या यह सामान अस्पताल में नहीं मिलता, तो कंपाउंडर आग बबूला हो गया. उसने धमकी भरे लहजे में कहा कि सामान लेकर नहीं आओगे तो ऑपरेशन नहीं होगा.

इस शर्मनाक वसूली का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. वीडियो में कंपाउंडर खुलेआम मेडिकल स्टोर का नाम लेता दिख रहा है. हैरानी की बात तो यह है कि दुकानदार भी बेखौफ होकर कैमरे पर चुनौती देता नजर आ रहा है कि ‘इधर-उधर भटकोगे, आखिर में आओगे तो यहीं. वीडियो से साफ है कि अस्पताल के कुछ स्टाफ और बाहर के मेडिकल स्टोर के बीच गहरी सांठगांठ है, जिसमें गरीब मरीज पिस रहा है.

इसे भी पढ़ें- फर्स्ट एसी भी सुरक्षित नहीं! ट्रेन में महिला के लाखों के गहने और नकदी चोरी, अखिलेश ने पोस्ट कर उठाए सवाल

न्याय के लिए भटक रहे विनोद कुमार ने मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को शिकायती पत्र लिखकर व्हाट्सएप पर भेजा है. उन्होंने मांग की है कि उनके पिता का ऑपरेशन पूर्णतः सरकारी खर्च पर किया जाए और कमीशनखोरी करने वाले दोषी डॉक्टर और कंपाउंडर पर सख्त कार्रवाई हो. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार मेडिकल कॉलेजों को करोड़ों का बजट देती है, तो ऑपरेशन का जरूरी सामान अस्पताल में क्यों नहीं है? क्या गरीबों के लिए बने सरकारी अस्पताल अब निजी दुकानों के एजेंट बन गए हैं? इस घटना ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खोल दी है.