लखनऊ. धीरेंद्र शास्त्री के बयान से सियासी पारा गरमा गया है. अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि दुष्मुखी लोगों के संबंध में ‘शासन-प्रशासन’ के साथ ही उनके कार्यक्रम करवाने वाले सभी आयोजकों और प्रायोजकों से विनम्र आग्रह है कि वो ऐसे तथाकथित कथाकारों से दूर ही रहें. ये ही नहीं, ऐसे एक-दो और भी तथाकथित कथावाचक हैं जो बोलने और पहनने से कथावाचक तो दिखते हैं पर कथा और प्रवचन उनका व्यवसाय है. वो समय-समय पर अपनी भौतिक उपलब्धि का भोंडा प्रदर्शन करते-करवाते रहते हैं. ऐसे लोग सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए सदैव अनर्गल बातें करते हैं. धन ही इनका धर्म होता है.
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आगे अखिलेश यादव ने कहा कि आयोजकों और प्रायोजकों को ये सोचना चाहिए कि ये कुछ भी कहकर राजनीतिक प्रश्रय पाकर बच निकलेंगे, लेकिन उन आयोजकों और प्रायोजकों को तो उसी शहर में जनता के बीच रहना है. इनके कुवचनों से जन्मे सामाजिक वैमनस्य का शिकार उन्हें ही होना पड़ेगा. जब जनता को ये नहीं मिलेंगे तो जनता इन जैसे नकारात्मक लोगों को आमंत्रित करने वालों को ही अपने कोप-आक्रोश का शिकार बनाएगी, क्योंकि आस्थावान तो यही मानेंगे कि ये दुर्वचनी भगवानों के बारे में जो अपशब्द या कुविचार प्रकट कर रहे हैं उनमें आयोजकों-प्रायोजकों की भी सहमति है.
आगे उन्होंने कहा कि इससे स्थानीय स्तर पर हर आस्थावान-श्रद्धालु इन आयोजकों-प्रायोजकों का विरोधी हो जाएगा. जो लोग इन जैसों को बुलाकर स्थानीय स्तर पर अपनी धाक जमाना चाहते हैं, वो सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत नुक़सान भोगेंगे और जनता की निगाह में उनकी धर्म-विरोधी, भगवान विरोधी छवि बन जाएगी. सामान्य शब्दों में कहा जाए तो उनको ‘लेन के देने’ पड़ जाएंगे, उनकी सारी राजनीति धरी की धरी रह जाएगी.
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अखिलेश यादव ने ये भी कहा कि अतः आयोजकों-प्रायोजकों से पुन: आग्रह है कि समाज-सनातन के बीच खाई पैदा करने वाले ऐसे लोगों को खाद-पानी देकर उनकी विषबेल न बढ़ाएं, न ही ईशनिंदा में भागीदार बनें अन्यथा इनके मौखिक पापों की सज़ा उन्हें भी भुगतनी पड़ेगी. हमारे देश में ऐसे अनेक सच्चे ‘विचारक-वाचक’ उपलब्ध हैं जो वैदिक-औपनिषदिक बोध की गहराइयों के प्रशांत महासागर हैं तो महाकाव्यों के संदेशों की ऊँचाइयों के हिमालय भी हैं. आयोजक-प्रायोजक उन जैसे सहृदय, सुभाषी, सुधिजनों को आमंत्रित करें और मानवीय जीवन को बेहतर बनाने का पुण्य कमाएं.

