शामली. सीएम योगी जीरो टॉलरेंस का पाठ पढ़ाते ठकते नहीं, लेकिन उनका सिस्टम है कि मानने को तैयार ही नहीं है. ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि सिस्टम में बैठे नुमाइंदों को फुल टॉलरेंस पसंद है. अगर ऐसा न होता तो शामली जिला अस्पताल में डॉक्टर एक गर्भवती महिला के परिजनों से भर्ती करने के बदले 50 हजार रुपए की डिमांड न करते. डॉक्टरों की इस करतूत की वजह से अस्पताल के बाहर ही महिला की डिलवरी हो गई. ऐसे में सीएम योगी के उन दावों का क्या हुआ, जब वे यूपी में विश्वस्तरीय सुविधा होने का बड़ा- बड़ा दावा करते हैं? क्या यही है उनकी जीरो टॉलरेंस नीति की सच्चाई?
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बता दें कि बागपत जिले का निवासी उस्मान की गर्भवती पत्नी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो वह अपनी पत्नी को लेकर जिला अस्पताल शामली पहुंचा. जहां डॉक्टरों ने महिला की स्थिति खराब बताते हुए भर्ती करने से इंकार कर दिया. इलाज करने के बदले 50 हजार रुपए की डिमांड भी गई. परिजनों ने पैसे न होने की बात कही तो मेरठ ले जाने की सलाह दी. जिसके बाद मजबूर परिजन महिला को लेकर अस्पताल के मेन गेट पर पहुंचे ही थे कि महिला का दर्द बढ़ गया.
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नौबत ऐसी आई कि परिजनों ने गर्भवती को मेन गेट के बाहर ही चादर पर लिटा दिया. जिसके बाद महिलाओं ने गर्भवती का प्रसव कराया. गर्भवती ने बेटे को जन्म दिया. पूरे मामले का वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है. वायरल वीडियो में 50 हजार रुपए मांगने की बात कही गई. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ऑपरेशन की सुविधा होने के बाद भी आखिर डॉक्टरों ने गर्भवती महिला को इलाज के लिए भर्ती क्यों नहीं किया? क्या अब योगी सरकार में सरकारी अस्पतालों में भी इलाज के लिए पैसे देने होंगे? भाजपा सरकार जिस विकास की बात करती है, क्या वह यही विकास है?
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