VIDEO : खुले में पोस्टमार्टम कर विवादों में आए डॉ. उल्हास गोन्नाडे की कहानी, पाए गए थे फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के सहारे नौकरी करने के दोषी…आदेश के बाद भी नहीं हो सका है अब तक एफआईआर !

सत्यपाल सिंह राजपूत, रायपुर। बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान(सिम्स) के परिसर में खुले पोस्टमार्टम कर विवादों में आए डॉ. उल्हास गोन्नाडे फर्जी तरीके से नौकरी पाने के आरोपी हैं. राज्य सरकार की ओर से शिकायत पर जब डॉ. उल्हास के प्रमाण-पत्रों की जाँच हुई थी, तो वे फर्जी पाए गए थे.

डॉ. उल्हास गोन्नाडे मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग से चयनित होने के बाद राज्य सेवा के प्रदर्शक फोरेंसिक मेडिसीन चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर में सन् 1994 में पदस्त हुए थे. उनका चयन अनुसूचित जनजाति वर्ग में हुआ था. लेकिन 2008 में आदिवासी विकास परिषद की ओर से डॉ. उल्हास के खिलाफ पहली शिकायत हुई. शिकायत फर्जी जाति प्रमाण-पत्र से नौकरी करने की थी. इसके बाद दूसरी सन् 2016 में विकास कुमार ने की. पहली शिकायत के आधार पर 17 मार्च 2017 को उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति गठित की गई.  21 फ़रवरी 2018 को भी जारी अधिसूचना के आधार पर उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति की पुनर्गठन किया गया.  हाई पावर कमेटी ने जाँच में शिकायत को सही पाया गया.

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हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 सितंबर 2019 को डॉक्टर उल्हास गोन्नाडे सह प्राध्यापक फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान बिलासपुर की सेवा को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का आदेश जारी किया. हाई पावर कमेटी ने 14 फ़रवरी 2019 को रिपोर्ट सौंपा, जिसमें 13 बिंदुओं में जाँच के आधार पर अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण पत्र को निरस्त किया, जिस जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल किया था और कार्रवाई करने की अनुशंसा किया था. लेकिन इस फैसले के खिलाफ निलंबित डॉ. उल्हास हाईकोर्ट चला गया. हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2019 को निलंबित डॉक्टर को वैकल्पिक स्टे दिया और शासन को तीन हफ़्ते में अपना पक्ष रखने को कहा था.

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विकास कुमार ध्रुव ने संचालनालय मेडिको लीगल संस्थान के प्रभारी निदेशक ने बताया कि डॉक्टर उल्हास गन्नाडे के विरुद्ध उच्च न्यायालय में सेवा समाप्त करने एवं क़ानूनी कार्रवाई को लेकर कैविएट दायर नहीं किया गया है, जबकि चिकित्सा शिक्षा विभाग ने कैविएट दायर करने सर्कुलेशन जारी किया था उसके बावजूद भी षड्यंत्र पूर्वक कैविएट दायर नहीं किया गया, जिसका फ़ायदा निलंबित गोन्नाडे को मिला है. फर्जी दस्तावेज पेश करने के लिए शासन और विभाग एवं मेडिकोलिगल संस्थान से एफआईआर के लिए पत्र लिखा गया था, लेकिन आज दिनांक तक एफआईआर दर्ज नहीं हुआ है.

 

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