दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने रेप के एक मामले की सुनवाई के दौरान महिलाओं की सुरक्षा और समाज के रवैये को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि महिलाएं, खासकर युवा लड़कियां, हमारे समाज में बेहद असुरक्षित होती हैं। कई बार पड़ोसी और रिश्तेदार भी उनकी इसी असुरक्षा का फायदा उठाते हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए आरोपी को मिली राहत कायम रखी।
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने समाज में महिलाओं और युवा लड़कियों की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कई बार उनके आसपास के लोग, जिनमें पड़ोसी और रिश्तेदार भी शामिल हैं, उनकी असुरक्षित स्थिति का फायदा उठाते हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति सामाजिक रवैये को लेकर चिंता को रेखांकित करती है। मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इसके खिलाफ चुनौती पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना।
पड़ोसी और रिश्तेदारों से भी खतरा
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिलाओं और युवा लड़कियों की सामाजिक असुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। जस्टिस विमल कुमार यादव राज्य सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें रेप के एक मामले में आरोपी को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह मामला वर्ष 2006 का है और इसमें एक युवती ने अपने पड़ोसी पर रेप का आरोप लगाया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि महिलाओं, खासकर युवा लड़कियों के लिए समाज में कई बार असुरक्षा की स्थिति बनी रहती है। ऐसे में उनके आसपास मौजूद लोग भी उनकी कमजोर स्थिति का फायदा उठा सकते हैं। कोर्ट ने पड़ोसियों और रिश्तेदारों जैसे करीबी लोगों की भूमिका को लेकर भी चिंता व्यक्त की।
महिलाओं के लिए भरोसा करना मुश्किल
अदालत ने कहा कि महिलाओं, खासकर युवा लड़कियों के लिए कई बार किसी पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। कोर्ट के मुताबिक, उनके आसपास मौजूद पड़ोसी और रिश्तेदार जैसे करीबी लोग भी उनकी कमजोर स्थिति का फायदा उठा सकते हैं। अदालत की यह टिप्पणी महिलाओं की सुरक्षा और उनके प्रति समाज के रवैये को लेकर चिंता को सामने रखती है। मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। निचली अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
रेप का असर मानसिक और मनोवैज्ञानिक जीवन पर भी पड़ता है
अदालत ने कहा कि रेप केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका पीड़िता के मानसिक और मनोवैज्ञानिक जीवन पर भी गहरा असर पड़ सकता है। ऐसी घटना उसके आत्मसम्मान और मानसिक स्थिति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है। कोर्ट ने समाज के उस रवैये पर भी चिंता जताई, जिसमें पीड़िता को सहानुभूति और सहयोग देने के बजाय उसके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं। अदालत ने कहा कि कई जगहों पर सामाजिक कलंक इतना गहरा होता है कि घटना के लिए पीड़िता को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाती है। अदालत के मुताबिक, अपमान, बदनामी और सामाजिक बहिष्कार जैसी परिस्थितियों के बीच यदि परिवार और समाज का सहयोग भी न मिले तो पीड़िता के लिए हालात और कठिन हो सकते हैं। कोर्ट ने ऐसे मामलों में पीड़िता के प्रति संवेदनशीलता, सहयोग और सामाजिक समर्थन की जरूरत पर जोर दिया।
2006 में युवती ने लगाया था रेप का आरोप
मामला मई 2006 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी उस समय युवती के घर में दाखिल हुआ, जब वह अकेली थी। आरोप है कि उसने दरवाजा अंदर से बंद कर युवती के साथ रेप किया। घटना के बाद युवती ने अपने भाई को इसकी जानकारी दी, जिसके बाद FIR दर्ज कराई गई। उसका बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ और मेडिकल जांच भी कराई गई। हालांकि, करीब तीन महीने बाद अदालत में गवाही देने से पहले युवती की मौत हो गई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसके छोड़े गए नोट में घटना से जुड़ी शर्मिंदगी को उसकी इस स्थिति का कारण बताया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने 2009 में आरोपी को किया था बरी
ट्रायल कोर्ट ने मामले में 18 अभियोजन गवाहों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद वर्ष 2009 में आरोपी को बरी कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि उपलब्ध साक्ष्य घटना की संभावना की ओर संकेत करते हैं, लेकिन युवती के जीवित न होने के कारण उसकी गवाही की पुष्टि नहीं हो सकी। आरोपी की ओर से भी दलील दी गई कि युवती की प्रत्यक्ष गवाही उपलब्ध नहीं है और अन्य साक्ष्यों में विरोधाभास हैं।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m

