आशुतोष तिवारी, जगदलपुर। बस्तर दशहरा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और अनूठी परंपराओं का ऐसा संगम है, जिसकी पहचान पूरी दुनिया में है। शनिवार रात काछन गादी की रस्म के साथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की शुरुआत हो गई। इस रस्म में पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू दास बेल के कांटों से बने झूले पर लेटकर दशहरा पर्व मनाने की अनुमति देती हैं। मान्यता है कि इस दौरान काछनदेवी कन्या के शरीर में प्रवेश कर राजपरिवार को पर्व शुरू करने की अनुमति देती हैं। करीब 600 साल पुरानी यह परंपरा आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

बस्तर दशहरा निर्विघ्न संपन्न हो और मां काछनदेवी का आशीर्वाद बना रहे, इसी कामना के साथ शनिवार रात पथरागुड़ा स्थित काछन गुड़ी में विशेष पूजा-अर्चना की गई। पनका समाज के विशेष परिवार की कुंवारी कन्या पीहू दास ने बेल के कांटों से बने झूले पर लेटकर राजपरिवार को दशहरा पर्व शुरू करने की अनुमति दी। पिछले पांच वर्षों से पीहू दास इस कठिन और अनूठी परंपरा का निर्वहन कर रही हैं।

मान्यता है कि काछनदेवी की अनुमति के बिना बस्तर दशहरा की शुरुआत नहीं होती। हर साल पितृमोक्ष अमावस्या के अवसर पर निभाई जाने वाली इस रस्म को देखने के लिए राजपरिवार के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालु काछन गुड़ी पहुंचते हैं। आधुनिक दौर में भी बस्तर की यह प्राचीन परंपरा यहां की सांस्कृतिक विरासत और गहरी धार्मिक आस्था को जीवंत बनाए हुए है।

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