Rajasthan News: गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित राष्ट्रीय समारोह में विभिन्न राज्यों की झांकियां निकाली गईं। इस दौरान राजस्थान की झांकी में बीकानेर की पारंपरिक उस्ता कला को प्रमुख रूप से प्रदर्शित किया गया, जिसने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।

उस्ता कला राजस्थान के बीकानेर की विशिष्ट और पारंपरिक चित्रकला शैली है। आमतौर पर भुजिया और मिठाइयों के लिए पहचाने जाने वाले बीकानेर की पहचान उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और इस अनूठी कला से भी जुड़ी हुई है। उस्ता कला को करीब 500 वर्ष पुरानी माना जाता है और यह बीकानेर की पारंपरिक शाही कला रही है।

शुरुआत में यह कला ऊंट की खाल और हाथी के दांत पर की जाती थी, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार लकड़ी, संगमरमर, कांच और दीवारों तक हो गया। इस कला में 24 कैरेट स्वर्ण पत्रा और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। सोने की नक्काशी और गोल्ड एम्बॉसिंग के जरिए जटिल और आकर्षक डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं।

‘उस्ता’ शब्द का अर्थ विशेषज्ञ या उस्ताद होता है, यानी ऐसा कुशल कलाकार जिसे अपने कार्य में पारंपरिक महारत हासिल हो। यही वजह है कि इस कला में बारीक काम, संतुलन और शाही वैभव साफ नजर आता है।

इतिहासकारों के अनुसार उस्ता कला की उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। मुगल काल में इसका विकास हुआ और बीकानेर के महाराजा राय सिंह के शासनकाल में यह कला राजस्थान पहुंची। यहां स्थानीय कारीगरों ने इसे नई पहचान दी और इसे बीकानेर की विशिष्ट कला शैली के रूप में स्थापित किया।

16वीं सदी से जुड़ी यह कला आज भी जूनागढ़ किले के अनूप महल और फूल महल जैसी ऐतिहासिक इमारतों में देखी जा सकती है। उस्ता कला में ईरानी, मुगल और राजपूताना शैली का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

इस कला को आधुनिक समय में पुनर्जीवित करने का श्रेय पद्मश्री से सम्मानित कलाकार हिसामुद्दीन उस्ता को जाता है। उन्होंने 1960 के दशक में उस्ता कला को फिर से जीवंत किया और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। गणतंत्र दिवस की झांकी में इस कला की प्रस्तुति ने बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत को देश-दुनिया के सामने एक बार फिर उजागर किया।

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