दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा है कि किसी अपराध की गंभीरता ही समय से पहले रिहाई (प्रिमेच्योर रिलीज) रोकने का अकेला आधार नहीं बन सकती। यह टिप्पणी अदालत ने 23 फरवरी को सुनाए गए एक फैसले में दी। इस मामले में, डकैती और हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को समय से पहले रिहाई का रास्ता साफ कर दिया गया। कोर्ट ने यह निर्णय अपराध की गंभीरता के बावजूद सुधार और व्यवहार को ध्यान में रखते हुए लिया।
दिल्ली हाई कोर्ट सजा समीक्षा बोर्ड के फैसले को किया रद्द
जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने सजा समीक्षा बोर्ड के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें डकैती और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक बांग्लादेशी नागरिक की रिहाई की मांग ठुकरा दी गई थी। बोर्ड ने अपराध को जघन्य बताते हुए और दोबारा अपराध करने की आशंका जताकर याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, केवल उसी आधार पर रिहाई से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कैदी के जेल में व्यवहार, सुधार, पुनर्वास की संभावना और भविष्य में अपराध करने की वास्तविक आशंका जैसे पहलुओं का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
23 फरवरी को दिए गए इस फैसले में हाई कोर्ट ने सजा समीक्षा बोर्ड के निर्णय को रद्द करते हुए कैदी की समय से पहले रिहाई का रास्ता साफ कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रिमेच्योर रिलीज पर निर्णय लेते समय मानवीय और सुधारात्मक न्याय के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आरोपी ने 21 साल से ज्यादा की वास्तविक सजा पूरी की थी
जस्टिस संजीव नरूला की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान दलील दी गई कि याचिकाकर्ता 21 साल से अधिक की वास्तविक सजा काट चुका था, जबकि रिमिशन सहित उसकी कुल सजा 27 साल से ज्यादा हो चुकी थी। वर्ष 2021 में उसे शेष सजा पूरी करने के लिए बांग्लादेश भेजा गया था, जहां की जेल रिपोर्ट में उसका आचरण संतोषजनक और कानून का पालन करने वाला बताया गया। अदालत ने कहा कि सजा नीति का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक जेल में रहने और सुधार दिखाने के बाद गंभीर अपराधों के दोषी भी रिहाई के योग्य हो सकते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना SRB ने मामले में आकलन सही नहीं किया
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि समय से पहले रिहाई (प्रिमेच्योर रिलीज) के मामलों में निष्पक्ष और संतुलित आकलन अनिवार्य है। अदालत ने माना कि सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) ने मामले का संतुलित मूल्यांकन नहीं किया और केवल अपराध की प्रकृति तथा अनुमानित खतरे के आधार पर फैसला लिया। जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने स्पष्ट किया कि पात्रता पूरी करने के बाद कैदियों को निष्पक्ष, सार्थक और गैर-मनमाने तरीके से रिहाई पर विचार किए जाने का अधिकार होता है।
कोर्ट ने कहा कि किसी अपराध की गंभीरता मात्र के आधार पर रिहाई से इनकार नहीं किया जा सकता और कैदी के जेल में व्यवहार, सुधार, पुनर्वास की संभावना तथा भविष्य में अपराध की वास्तविक आशंका जैसे पहलुओं का भी निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें English में पढ़ने यहां क्लिक करें
- खेल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
- मनोरंजन की बड़ी खबरें पढ़ने के लिए करें क्लिक


