Bastar News Update : जगदलपुर कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में मिली लाखों साल पुरानी ग्रीन केव अब अस्तित्व के संकट में है। 2 महीने पहले खोजी गई इस गुफा को पर्यटन स्थल बनाने की जल्दबाजी भारी पड़ती दिख रही है। प्रवेश द्वार और सीढ़ी निर्माण के दौरान उड़ती धूल ने गुफा की हरी जैविक चमक को फीका कर दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक यह हरियाली सूक्ष्मजीवी परतों से बनी थी, जिसे दोबारा बनना असंभव है। निर्माण पर रोक के बावजूद काम जारी रहने से हालात और बिगड़े। अब गुफा को पानी से धोने की तैयारी नई तबाही का संकेत दे रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसा कदम स्थायी नुकसान पहुंचाएगा। करीब 50 लाख रुपये की योजना पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों की आपत्ति के बाद मामला अदालत तक पहुंचा। जिम्मेदार अधिकारी सवालों से दूरी बनाए हुए हैं। सवाल है क्या पर्यटन के नाम पर प्रकृति की हत्या जायज़ है?

युवक ने पुल से लगाई छलांग, पूरे शहर में मातम
जगदलपुर। शहर के कोतवाली क्षेत्र में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। मंगलवार रात एक युवक ने इंद्रावती नदी के नए पुल से छलांग लगा दी। सूचना मिलते ही पुलिस और एसडीआरएफ मौके पर पहुंची। अंधेरा और तेज बहाव रेस्क्यू में बड़ी चुनौती बना। रातभर तलाश के बाद ऑपरेशन रोकना पड़ा। सुबह दोबारा सर्च अभियान शुरू किया गया। काफी मशक्कत के बाद युवक का शव बरामद हुआ। मृतक की पहचान तरुण दास के रूप में हुई। तरुण पुलिस लाइन का निवासी था। माता-पिता दोनों पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। घटना से पुलिस परिवार और इलाके में शोक की लहर है।
पुलिस आत्मघाती कदम के कारणों की जांच कर रही है।
मौसम बदला, अस्पतालों पर दबाव
बस्तर। मौसम में उतार-चढ़ाव का सीधा असर सेहत पर पड़ने लगा है। शहर के महारानी जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ी है। ओपीडी से लेकर वार्ड तक भीड़ नजर आ रही है। डॉक्टरों के अनुसार सांस संबंधी मरीज सबसे ज्यादा आ रहे हैं। नमी और ठंडक ने श्वसन तंत्र को प्रभावित किया है। बच्चों में सर्दी, खांसी और दस्त के मामले बढ़े हैं।
स्वास्थ्य अमले पर काम का दबाव बढ़ा है। डॉक्टरों ने सतर्कता बरतने की अपील की है। गुनगुना पानी और ताजा भोजन की सलाह दी गई है। बासी और ठंडे खाने से परहेज जरूरी बताया गया है। मौसम सामान्य होने तक सावधानी ही बचाव है। स्वास्थ्य विभाग हालात पर नजर बनाए हुए है।
बारिश ने बदला मिजाज
बस्तर। अचानक बदले मौसम ने बस्तर का मिजाज बदल दिया है। हल्की बारिश और बादलों ने ठंडक बढ़ा दी है। न्यूनतम तापमान 16.7 डिग्री दर्ज किया गया। पश्चिमी विक्षोभ के असर से मौसम में बदलाव आया। अगले 24 घंटे बूंदाबांदी की संभावना है। 2 मार्च तक एक-दो जगह बारिश के आसार हैं। अधिकतम तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होगी। हवा में नमी बढ़कर 74 प्रतिशत तक पहुंची। बीते 24 घंटे में 3 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुई। सुबह कोहरा कम नजर आया। मौसम वैज्ञानिकों ने सतर्क रहने की सलाह दी है। आने वाले 6 दिन मौसम उतार-चढ़ाव वाला रहेगा।
परंपरा में जीवित है जनजातीय विरासत
दंतेवाड़ा। फागुन मंडई में सदियों पुरानी आखेट परंपराएं जीवंत हो उठीं। चौथी पालकी के साथ लम्हा मार का नाटकीय स्वांग रचा गया। खरगोश, हिरण और वनभैंसे के प्रतीकात्मक शिकार का मंचन हुआ। पूरी रात चलने वाले नृत्य आकर्षण का केंद्र बने। गंवरमार सबसे लोकप्रिय आखेट नृत्य माना जाता है। देवी-देवताओं की पालकियां गांव-गांव से पहुंचीं। हजार से अधिक देव विग्रहों की उपस्थिति दर्ज की गई। मौसम खराब होने के बावजूद उत्साह कम नहीं हुआ। मेला स्थल पर भारी भीड़ उमड़ी। आखेट नृत्य जनजातीय संस्कृति की पहचान हैं।
परंपराएं आज भी समाज को जोड़ रही हैं। फागुन मंडई के साथ सांस्कृतिक विरासत जीवित है।
खदान में लापरवाही, बड़ा हादसा
बचेली। लौह नगरी बचेली की एनएमडीसी डिपॉजिट-5 खदान में बड़ा हादसा हुआ। वेस्ट माइनिंग डंप क्षेत्र में सड़क निर्माण चल रहा था। बिना सुरक्षा मानकों के पोकलेन से काम कराया जा रहा था। अचानक जमीन धंसी और मशीन 300 मीटर नीचे फिसल गई। ऑपरेटर वेद प्रकाश पांडेय गंभीर रूप से घायल हुए। उन्हें पहले बचेली और फिर हैदराबाद रेफर किया गया। हादसे के बाद अधिकारी चुप्पी साधे नजर आए। मशीन को बाहर निकाल लिया गया है। ब्लू डस्ट क्षेत्र को बेहद अस्थिर बताया जाता है। विशेषज्ञ बेंच कटिंग अनिवार्य बताते हैं। पहले भी सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब जांच और जवाबदेही की मांग तेज है।
600 साल पुरानी राजशाही होली की तैयारियां शुरू
बस्तर। माड़पाल में ऐतिहासिक राजशाही होली की तैयारियां शुरू हो गई हैं। यह परंपरा 600 साल से अधिक पुरानी है। राजपरिवार मावली माता की पूजा कर रथारोहण करता है। होलिका दहन में सात प्रकार की लकड़ियों का उपयोग होता है। इस बार तेंदू लकड़ी माचकोट जंगल से लाई जाएगी। 13 मार्च की रात होलिका दहन होगा। रथ निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। बस्तर दशहरे की तर्ज पर रथ परंपरा निभाई जाती है। राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ी कथा आज भी जीवित है।।ग्रामीणों की आस्था इस उत्सव से जुड़ी है। हर साल हजारों लोग शामिल होते हैं। माड़पाल होली बस्तर की अनूठी पहचान है।
जंगल बचाने के पुराने नियम, आज का संकट
बस्तर। बस्तर के जंगलों पर खेती का दबाव लगातार बढ़ रहा है। वन अधिकार पट्टा योजना से बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। लोग जंगल काटकर धान और मक्का की खेती कर रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य वनविहीन हो सकता है।
रियासत काल में जंगल बचाने के सख्त नियम थे। धान बोने पर टैक्स और पाबंदियां लगाई जाती थीं। आज पारंपरिक फसलें पीछे छूट गई हैं। बस्तर जिले में लाखों एकड़ वनभूमि खेती में बदल चुकी है। वनौषधि और वन्यजीव संकट में हैं। पुराने नियमों को त्यागना बड़ी भूल बताया जा रहा है। संतुलन नहीं बना तो नुकसान अपूरणीय होगा। जंगल बचाने पर फिर गंभीर मंथन जरूरी है।
मुख्यधारा की ओर लौटते कदम
सुकमा। नक्सल प्रभावित सुकमा में बदलाव की नई तस्वीर सामने आई है। 70 आत्मसमर्पित युवाओं को 5G स्मार्टफोन दिए गए। 31 युवाओं को राजमिस्त्री किट वितरित की गई। कार्यक्रम नक्सल पुनर्वास केंद्र में आयोजित हुआ। कलेक्टर अमित कुमार ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। एसपी किरण चव्हाण ने सुरक्षा और सहयोग का भरोसा दिलाया। मोबाइल से डिजिटल शिक्षा और योजनाओं से जुड़ाव होगा। युवाओं को कौशल प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। पुनर्वास केवल आत्मसमर्पण नहीं, नई जिंदगी है। युवाओं ने बदलाव को जीवन का मोड़ बताया। प्रशासन हर कदम पर साथ खड़ा है। जंगल से समाज की मुख्यधारा तक का सफर जारी है।
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