संजीव शर्मा, कोंडागांव। कोंडागांव जिले में फलदार और प्रतिबंधित वृक्षों की अवैध कटाई और तस्करी का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है, और इस खेल का वन विभाग के अधिकारियों का शह मिल रहा है. इसका नमूना जिले के बोरगांव के पास लकड़ी से लदी दो गाड़ियों को घेराबंदी कर पकड़ने के बाद देखने को मिला, जब अधिकारी ने कागजात को सही बताते हुए गाड़ियों को तुरंत छोड़ने का आदेश दे दिया.
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जानकारी के अनुसार, मुखबिर की मिली सटीक सूचना पर वन विभाग के अमले ने दो गाड़ियों (CG-07 CH 6304 और
CG-07 CJ 3729) को पकड़ा, जिनमें भारी मात्रा में प्रतिबंधित आम और सेमल की लकड़ियां भरी हुई थी. कर्मचारियों ने जैसे ही गाड़ियों की जांच शुरू की, उपवनमंडलधिकारी (SDO) ने मौके पर मौजूद अमले को निर्देश दिया कि “गाड़ियों के कागज ओके हैं, इन्हें तुरंत छोड़ दिया जाए.”

अधिकारी के आदेश पर कर्मचारियों ने गाड़ी तो तुरंत छोड़ दी, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बिना भौतिक सत्यापन और ट्रांजिट पास (TP) की मौके पर जांच किए, महज एक फोन कॉल के आधार पर अवैध वनोपज को कैसे वैध घोषित किया जा सकता है?
अंतर्राज्यीय तस्करी का संदेह
पकड़ी गई दोनों गाड़ियां दुर्ग-भिलाई (CG-07) पासिंग हैं. स्थानीय ग्रामीणों का सवाल है—यदि लकड़ी का परिवहन इतना ही सरल है, तो रायपुर-दुर्ग से गाड़ियां विशेष रूप से कोंडागांव के ग्रामीण अंचलों में लकड़ी लेने क्यों आ रही हैं? यह किसी बड़े संगठित गिरोह की ओर इशारा करता है.
कैमरे देख भागे अधिकारी
जब मीडिया ने इस संदिग्ध कार्रवाई पर SDO से पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने कैमरे पर बाइट देने से साफ इनकार कर दिया. हालांकि, मीडिया के पास उपलब्ध विशेष वीडियो रिकॉर्डिंग में अधिकारी यह तर्क देते सुने जा रहे हैं कि “आम और सेमल को पंचायत स्तर पर बिना किसी अनुमति के काटकर परिवहन किया जा सकता है.” विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकारी का यह बयान न केवल भ्रामक है, बल्कि विभागीय राजपत्र के भी खिलाफ है.
क्या कहता है कानून? (तथ्यों की पड़ताल)
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता और भारतीय वन अधिनियम के तहत नियम अत्यंत सख्त हैं:
आम और सेमल: आम एक फलदार वृक्ष है और सेमल इमारती लकड़ी की श्रेणी में आता है. इनकी कटाई के लिए राजस्व विभाग (SDO राजस्व) की अनुमति अनिवार्य है.
ट्रांजिट पास (TP): बिना ‘हथौड़ा निशान’ और वन विभाग के TP के इनका परिवहन पूरी तरह अवैध है.
छूट की श्रेणी: प्रदेश में केवल नीलगिरी, बबूल और सूबबूल जैसी प्रजातियों को ही परिवहन पास से छूट प्राप्त है.
चुप्पी और गहराते सवाल
क्या पंचायत के पास यह संवैधानिक अधिकार है कि वह वन विभाग के टीपी के बिना लकड़ी का अंतर्राज्यीय या अंतर्जिलीय परिवहन करवा दे? बोरगांव में पकड़ी गई लकड़ियां कहाँ से आ रही थीं और उनका अंतिम गंतव्य क्या था? SDO द्वारा नियमों की गलत व्याख्या करना क्या किसी बड़े भ्रष्टाचार को छुपाने की कोशिश है?
‘संदिग्ध’ आदेश की होगी जांच?
इस प्रकरण ने जिला प्रशासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस ‘संदिग्ध’ आदेश की जांच करेंगे या फिर नियमों की आड़ में कोंडागांव के हरे-भरे जंगल इसी तरह बलि चढ़ते रहेंगे.
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