केंद्र सरकार द्वारा भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) के नियमों में किए गए संशोधन को लेकर पंजाब और हरियाणा में सियासी विवाद गहरा गया है। विद्युत मंत्रालय ने ‘भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (संशोधन) नियम 2026’ जारी कर दिए हैं, जिसके तहत अब बोर्ड के शीर्ष पदों पर अन्य राज्यों के अधिकारियों की नियुक्ति का रास्ता भी खोल दिया गया है।
अब नहीं रहेगा पंजाब-हरियाणा का वर्चस्व
अब तक BBMB के अहम पदों—सदस्य (सिंचाई) और सदस्य (विद्युत)—पर नियुक्ति मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के अधिकारियों तक सीमित रहती थी। नए नियमों में इन दोनों राज्यों को प्राथमिकता देने की बात तो कही गई है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं रखा गया है। इससे पहले की तरह इन पदों पर केवल इन्हीं राज्यों के अधिकारियों की नियुक्ति की गारंटी खत्म हो गई है।
योग्यता और अनुभव की नई शर्तें लागू
संशोधित नियमों के अनुसार, सदस्य (सिंचाई) पद के लिए उम्मीदवार के पास सिविल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री और कम से कम 20 साल का अनुभव होना जरूरी होगा। वहीं सदस्य (विद्युत) पद के लिए इलेक्ट्रिकल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री के साथ 20 वर्षों का अनुभव अनिवार्य किया गया है।
सरकार का कहना है कि यदि पंजाब और हरियाणा से उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलते, तो अन्य राज्यों के अधिकारियों को भी नियुक्त किया जा सकेगा।
पंजाब ने बताया ‘संघीय ढांचे पर हमला’
हरजोत सिंह बैंस ने इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसे संघीय ढांचे और राज्य के अधिकारों पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि पहले BBMB में पंजाबी अधिकारियों की नियुक्ति अनिवार्य होती थी, लेकिन अब देश के किसी भी हिस्से से अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है, जिससे राज्य के हित प्रभावित हो सकते हैं।
हरियाणा में भी विरोध, हुड्डा ने उठाए सवाल
वहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी नए नियमों को हरियाणा विरोधी करार दिया। उन्होंने कहा कि राज्य गठन के समय बोर्ड में संतुलन बनाए रखने के लिए तय किया गया था कि सिंचाई सदस्य हरियाणा से और बिजली सदस्य पंजाब से होगा, जबकि अध्यक्ष हिमाचल प्रदेश से होगा। नए नियम इस संतुलन को खत्म करते हैं।

पहले भी रहा है विवाद
BBMB को लेकर पहले भी विवाद सामने आ चुका है, जब पानी के बंटवारे को लेकर पंजाब और हरियाणा आमने-सामने आ गए थे। भगवंत सिंह मान ने नंगल में इस मुद्दे पर विरोध भी दर्ज कराया था।
फिलहाल, नए नियमों को लेकर दोनों राज्यों में राजनीतिक तापमान बढ़ गया है और केंद्र सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की जा रही है।
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