सोनीपत नगर निगम चुनाव से ठीक पहले हरियाणा कांग्रेस में बड़ा सियासी ड्रामा देखने को मिला है। कांग्रेस के मेयर पद के अधिकृत उम्मीदवार कमल दीवान (Kamal Diwan) ने नामांकन दाखिल करने के महज 24 घंटे के भीतर ही चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। बताया जा रहा है कि पार्टी के भीतर टिकट वितरण को लेकर चल रही गुटबाजी और आपसी कलह इस फैसले की मुख्य वजह है।
सोनीपत। नगर निगम चुनाव (Municipal Corporation Election) में कांग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बुधवार को ही रोहतक सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा और सोनीपत सांसद सतपाल ब्रह्मचारी की मौजूदगी में बड़े दमखम के साथ नामांकन (Nomination) भरने वाले कमल दीवान अब चुनावी मैदान से हट गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, कमल दीवान पार्टी के भीतर मचे घमासान और गुटबाजी से नाराज हैं। विशेष रूप से पार्षद प्रत्याशियों के टिकट चयन को लेकर पार्टी के दो गुट आमने-सामने हैं। दीवान उन लोगों को टिकट दिए जाने के खिलाफ थे जिन्होंने पिछले उपचुनावों में कांग्रेस विरोधी काम किया था, लेकिन हाईकमान के दबाव और अंदरूनी खींचतान के चलते उन्होंने पीछे हटना ही बेहतर समझा।
दीपेंद्र हुड्डा के दावों पर फिरा पानी
अभी एक दिन पहले ही सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए सोनीपत में विकास और सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस की जीत का दावा किया था। उन्होंने हर वार्ड के लिए अलग घोषणा पत्र (Manifesto) लाने का भी ऐलान किया था, लेकिन प्रत्याशी के इस कदम ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। शहर में चर्चा है कि अगर मेयर पद का मुख्य चेहरा ही ऐन वक्त पर मुकर जाता है, तो कार्यकर्ताओं के मनोबल पर इसका गहरा असर पड़ेगा। फिलहाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल दीवान को मनाने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आया है।
भाजपा के राजीव जैन की राह हुई आसान?
कांग्रेस की इस अंदरूनी फूट का सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिलता दिख रहा है। भाजपा ने शहर के वर्तमान मेयर राजीव जैन (Rajiv Jain) को दोबारा चुनावी मैदान में उतारा है। एक तरफ जहां भाजपा एकजुट होकर चुनाव प्रचार (Election Campaign) में जुटी है, वहीं कांग्रेस अपने ही घर की कलह को सुलझाने में नाकाम दिख रही है। अब देखना यह होगा कि क्या कांग्रेस हाईकमान कमल दीवान का विकल्प खोजता है या उन्हें दोबारा चुनाव लड़ने के लिए राजी कर पाता है। सोनीपत की राजनीति में आए इस नाटकीय मोड़ ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है।

