लखनऊ. सिराथू से विधायक पल्लवी पटेल और सपा मुखिया अखिलेश यादव के बीच अनबन जल्द ही किसी नतीजे में बदल सकती है. दोनों ने अलग राह पकड़ ली है और बहुत आगे तक पहुंच चुके हैं. विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक बुधवार को लखनऊ में अखिलेश यादव के निर्देश पर सपा विधानमंडल दल की बैठक हुई. पल्लवी पटेल को बुलाया ही नहीं गया. दावा है कि ऐसा फैसला सीधे अखिलेश यादव के निर्देश पर लिया गया. अब तक पल्लवी पटेल को सपा की बैठकों में बुलाया जाता रहा है. पल्लवी पटेल अपना दल (कमेरावादी) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और अपना दल (कमेरावादी) के बीच गठबंधन हुआ था. इसके तहत कौशांबी जनपद की सिराथू विधानसभा से पल्लवी विधायक चुनी गई थीं. पल्लवी पटेल ने सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ा था.
अखिलेश यादव-पल्लवी पटेल में बातचीत बंद
सूत्रों का दावा तो यहां तक है कि अखिलेश यादव और पल्लवी पटेल के बीच कई महीनों से बातचीत बंद है. पल्लवी पटेल सपा प्रमुख से खासी नाराज हैं और सार्वजनिक मंचों पर सपा से दूरी बनाते और अखिलेश यादव की आलोचना करते नजर आ रही हैं. दोनों नेताओं के बीच किस बात को लेकर अनबन है- यह समझ नहीं आ रहा. क्या इसकी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारा विवाद था? मगर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पीडीए का नारा दे रहे अखिलेश के लिए पल्लवी के साथ अनबन को एक बड़ी चुनौती मान सकते हैं.
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UGC प्रदर्शन में सपा का साथ छोड़ा
फरवरी 2026 में यूजीसी नियमों के समर्थन में पल्लवी पटेल ने विधानसभा से मार्च निकाला था. तब पल्लवी पटेल ने सपा के किसी भी नेता को शामिल नहीं किया. सैकड़ों समर्थकों के साथ उन्होंने अकेले विरोध प्रदर्शन किया था और पुलिस से तीखी झड़प भी हुई थी. यह घटना दोनों दलों के बीच दूरी का पहला स्पष्ट संकेत थी. अब सपा की बैठक में पल्लवी को न बुलाया जाना- दोनों नेताओं के बीच अनबन का बड़ा सबूत है.
2024 में शुरू हुआ था विवाद
सपा और अपना दल (कमेरावादी) के बीच 2022 विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन हुआ था. 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान सीट बंटवारे पर दोनों दलों में खटास आ गई थी. पल्लवी पटेल ने मिर्जापुर, फूलपुर और कौशाम्बी जैसी सीटों पर दावा ठोका, जिसे सपा ने ठुकरा दिया. मिर्जापुर लोकसभा सीट से पल्लवी पटेल की बहन अनुप्रिया पटेल सांसद हैं.
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PDA एजेंडा से भटकने का आरोप
राज्यसभा उम्मीदवारों (जया बच्चन और आलोक रंजन) के चयन को लेकर पल्लवी पटेल खासा नाराज रहीं. उन्होंने खुलकर कहा था कि सपा अपने मूल PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) एजेंडा से भटक रही है और बहुजन वर्गों की उपेक्षा कर रही है. नाराजगी इतनी बढ़ी कि उन्होंने राज्यसभा चुनाव में सपा के रुख के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए.
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