नेपाल सरकार ने भारत और चीन को एक कूटनीतिक लेटर यानी डिप्लोमैटिक प्रोटेस्ट नोट भेजा है, जिसमें लिपुलेक पास से होकर कैलाश मानसोवर यात्रा के संचालन का जिक्र किया है। जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई है. नेपाल का कहना है कि यह इलाका उसकी भूमि का हिस्सा है और इस पर कोई भी गतिविधि स्वीकार नहीं है. हालांकि भारत ने नेपाल की आपत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए MEA ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रे पर नेपाल का दावा न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही न्यायसंगत.

नेपाल ने लिपुलेक के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत-चीन को ‘प्रोटेस्ट नोट’ भेजा है. इस पर भारत ने सख्त जवाब देते हुए कहा कि लिपुलेक 1954 से हमारा पुराना रास्ता है और नेपाल के दावे बेबुनियाद बताया.

कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और नेपाल सरकार के बीच कई बार विवाद देखने को मिल चुका है. नेपाल की नई बालेन शाह सरकार ने एक बार फिर से रविवार (3 मई, 2026) को मानसरोवर यात्रा को लेकर सीमा संबंधी दावों को उठाया है. भारत की विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा है कि लिपुलेख पास साल 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक स्थापित रास्ता है और इस रास्ते से पिछले कई दशकों से यात्रा लगातार जारी है, यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार (3 मई, 2026) को कहा, ‘सीमा को लेकर किए जाने वाले दावों के संबंध में भारत ने हमेशा यही कहा है कि ऐसे दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं. इस तरह के एकतरफा और आर्टिफिशियल तरीके से क्षेत्रीय दावों का विस्तार करना किसी भी तरीके से स्वीकार नहीं किया जाएगा.’

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है, जिसमें सहमति से लंबित सीमा विवादों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाना भी शामिल है.’

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार (3 मई, 2026) को लिपुलेख से होकर गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत को एक प्रोटेस्ट नोट लिखा. इसमें नेपाली विदेश मंत्रालय ने कहा कि नेपाल ने अपनी चिंता भारत और चीन के साथ साझा की है. 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का इलाका नेपाल के संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा है.

नेपाल कहता है कि भारत की इस क्षेत्र में गतिविधि उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है। दूसरी ओर भारत ने नेपाल के इस दावे को खारिज किया है कि नदी का स्रोत कालापानी गांव के पास के झरने हैं। भारत ने कई मौकों पर यह साफ-साफ कहा है कि लिपुलेख उसका हिस्सा है और लगातार बना रहेगा।

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