वीरेंद्र गहवई, बिलासपुर। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए एक महत्वपूर्ण आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। मामला अंबिकापुर का है, जहां नाबालिग आरोपियों को आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306/34 आईपीसी) के आरोप से बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।
यह याचिका 219 दिनों की देरी से दाखिल की गई थी, जिसके लिए राज्य सरकार ने प्रशासनिक प्रक्रिया और अनुमति लेने में समय लगने का तर्क दिया। हाईकोर्ट की जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने राज्य के इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल विभागीय प्रक्रिया और फाइलों के मूवमेंट को “पर्याप्त कारण” नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित समय सीमा सभी पर समान रूप से लागू होती है और सरकारी विभागों को भी उसी अनुशासन और तत्परता के साथ कार्य करना चाहिए।

कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि देरी को माफ करना अपवाद है, नियम नहीं। यदि देरी के पीछे ठोस और संतोषजनक कारण नहीं हैं तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी तंत्र की लापरवाही या ढिलाई का फायदा नहीं दिया जा सकता।
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार देरी के लिए कोई ठोस और विश्वसनीय कारण प्रस्तुत नहीं कर पाई। केवल अनुमति लेने में समय लगने की बात पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने देरी माफी की अर्जी को खारिज कर दिया। देरी माफी आवेदन खारिज होने के बाद स्वतः ही राज्य की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका भी निरस्त हो गई। इस फैसले के साथ ही नाबालिग आरोपियों को मिली पूर्व की बरी होने की राहत बरकरार रही।
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