रायपुर। रामचरित मानस की चौपाई, “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥” अर्थात्, जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है वह शासक नरक का अधिकारी होता है। यह चौपाई पश्चिम बंगाल में उभरी आज की समस्या के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह पंक्ति संकेत करती है कि सत्ता का मूल उद्देश्य जनकल्याण और जनादेश का सम्मान है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति अब धर्मसंकट के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा 2026 के विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद इस्तीफा देने से साफ इनकार ने राज्य में एक असामान्य संवैधानिक स्थिति उत्पन्न कर दी है। लोकतंत्र में चुनाव जनता के विश्वास और जनादेश का स्पष्ट प्रतिबिंब होता है ऐसे में हार के बाद भी सत्ता से चिपके रहने की जिद संवैधानिक मूल्यों को भी चुनौती देती हुई राजनीतिक मर्यादाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।

ममता बनर्जी का यह तर्क है कि वे “चुनाव नहीं हारीं बल्कि उन्हें हराया गया है” इस चुनाव में उनकी ‘नैतिक जीत’ हुई है। यह तर्क राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशादेने के लिए ज़रूर ठीक है मगर यह संवैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता। चुनाव प्रक्रिया पर सवाल कोई भी राजनीतिक दल अधिकार पूर्वक उठा सकता है लेकिन उसका समाधान न्यायपालिका के माध्यम से ही संभव है।
अब यहां राज्यपाल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनती है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि के पास संविधान द्वारा प्रदत्त इसके बहुत से विकल्प मौजूद हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री राज्यपाल की कृपा से ही अपने पद पर बने रहते हैं। यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करें तो राज्यपाल उन्हें पद छोड़ने की सलाह दे सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बर्खास्त भी कर सकते हैं। यह प्रावधान बनाया ही इसलिए गया है ताकि सत्ता का दुरुपयोग न हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था संतुलित बनी रहे।

पश्चिम बंगाल के मामले में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। ऐसे में भले ही मुख्यमंत्री इस्तीफा न दें फिर भी संवैधानिक रूप से नई विधानसभा के गठन और नई सरकार के शपथ ग्रहण में कोई बाधा नहीं आने वाली। राज्यपाल, मौजूदा मुख्यमंत्री को सीमित समय के लिए केवल कार्यवाहक की भूमिका में रख कर नई सरकार को आमंत्रित कर सकते हैं।
ममता बनर्जी द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। भारतीय चुआव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाना लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। यदि इन आरोपों में ज़रा भी सच्चाई है तो इसका परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। लेकिन यदि आरोप केवल राजनीतिक बयानबाजी है तो इसे जनता के विश्वास को कमजोर करने वाला कदम माना जाएगा।

मुख्य राजनीतिक विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी इस पूरे मुद्दे को जनादेश के अपमान के रूप में देख रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि सत्ता में बने रहने की यह जिद लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। मामता बनर्जी के द्वारा पैदा यह विवाद अब केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह अब पूरे देश में संवैधानिक मूल्यों पर बहस का विषय बन गया है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि “नैतिक जीत” की अवधारणा संवैधानिक हार को कैसे प्रभावित कर सकती है? नैतिकता और संवैधानिकता दोनों ही लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में जब दोनों के बीच टकराव होता है तब संविधान ही सर्वोपरि होता है। जनादेश की पवित्रता ही लोकतंत्र की शक्ति है और उसका सम्मान करना हर जनप्रतिनिधि की नैतिक जिम्मेदारी है।

फ़िलहाल पश्चिम बंगाल का यह संकट भारतीय लोकतंत्र के लिए मुश्किल परीक्षा की घड़ी है।अब बस इस पर सभी की नज़र है कि संवैधानिक संस्थाएं,राज्यपाल, न्यायपालिका और चुनाव आयोग इस बिगड़ी स्थिति को किस प्रकार संतुलित और न्यायपूर्ण तरीके से सुलझाती हैं। अब लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर है कि वह ऐसे संकट से सीख लेकर वो कैसे अधिक सुदृढ़ बनकर उभरती है।

लेखक – संदीप अखिल, सलाहकार संपादक न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

