Supreme court Hearing On Female genital mutilation: मुसलमान की दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन यानी एफजीएम (FGM) यानी खतना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। खतना पर सुनवाई सबरीमाला मामले की सुनवाई करने वाली 9 जजों की पीठ करेगी। फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन यानी महिलाओं के खतना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत उस समय भड़क गए, जब बचाव पक्ष ने यौन सुख बढ़ाने के लिए Female genital mutilation (FGM) होने बात कही। इस पर गंभीर टिप्पणी करते हुए संवैधानिक पीठ ने कहा है क धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा के अधीन है।

दरअसल, FGM को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई अब सबरीमाला मामले के साथ ही की जाएगी। इसका मुख्य कारण यह है कि संविधान के धार्मिक आजादी से जुड़े (अनुच्छेद 25 और 26) जो मुद्दे वर्तमान में 9 जजों की पीठ के विचाराधीन हैं, उनका सीधा प्रभाव इस मामले पर भी पड़ेगा। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ (जिसमें जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमनुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची शामिल हैं) कर रही है।

खतना की वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने देश के शीर्ष न्यायालय में तर्क रखा कि यह प्रथा महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है। जबकि दूसरी ओर इस प्रथा के समर्थकों ने कहा कि यह प्रथा उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत इसे जारी रखने का अधिकार है।

याचिकाकर्ताओं के वकीक का तर्क

FGM का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने 9 जजों की पीठ के सामने तर्क रखा कि यह प्रथा 7 साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है। इससे उनके शरीर में ऐसा बदलाव आता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, जिसका असर उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने दलील दी कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर वे इसका पालन नहीं करेंगे तो उन्हें समाज से निकाल दिया जाएगा। लूथरा ने तर्क दिया कि इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

जस्टिस बागची बोले- आर्टिकल 25 में स्वास्थ्य ही प्राथमिकता

इसपर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस प्रथा को रोकने के लिए शायद बहुत जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े क्योंकि इस प्रथा पर आर्टिकल 25 के तहत स्वास्थ्य के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है। जस्टिस बागची ने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में ही मिलेगी। जस्टिस बागची ने कहा, ‘जहां तक महिलाओं के खतना (FGM) का सवाल है, हमें शायद दूसरे अधिकारों पर विचार करने की भी जरूरत न पड़े। इसके लिए सिर्फ स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही काफी हो सकते हैं।

खतना से 10,000 तंत्रिका-सिरों को नुकसान, 59 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगायाः एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा

इस बात से सहमति जताते हुए खतना का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता के एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने इस प्रथा में महिला के क्लिटोरिस के आस-पास की त्वचा को हटा दिया जाता है। इससे कम से कम 10,000 तंत्रिका-सिरों (nerve endings) को ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। लूथरा ने कहा कि यह महिलाओं के शरीर के एक बहुत जरूरी अंग को काटना है।इसका सीधा असर उनकी शारीरिक, प्रजनन और भावनात्मक सेहत पर पड़ता है। जहां कोई प्रथा किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता में दखल देती है और किसी जरूरी अंग को नुकसान पहुंचाती है तो वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत तय सीमाओं यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी बताया कि 59 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

सभी जस्टिस ने रखे अपने विचार

जस्टिस वराले ने इसके प्रभाव को कई गुना बताते हुए चिंता व्यक्त की। वहीं जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि इस प्रथा का मूल उद्देश्य महिलाओं की कामुकता (sexuality) को नियंत्रित करना था। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के आधार पर भी सवालों के घेरे में आएगी। जस्टिस बागची ने कहा कि इस प्रथा का पालन न करने पर समाज से बहिष्कृत किए जाने के परिणामों के साथ-साथ इस धार्मिक प्रथा का किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक समग्रता पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जांच किए जाने की जरूरत है।

प्रथा के समर्थकों के वकील ने प्रक्रिया को अंग-भंग कहने पर आपत्ति जताई

फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन यानी एफजीएम प्रथा के समर्थकों के वकील निजाम पाशा ने स्पष्ट किया कि फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) का पालन न करने की स्थिति में किसी भी सदस्य को समुदाय से निष्कासित नहीं किया जाता। उन्होंने इस प्रक्रिया को अंग-भंग (mutilation) के रूप में परिभाषित किए जाने पर भी कड़ा विरोध जताया। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह एक तथ्यात्मक पहलू है जिस पर अलग से विचार किया जाएगा। पाशा ने तर्क दिया कि समुदाय के भीतर इस प्रथा को न अपनाने के कोई सांसारिक या सामाजिक दुष्परिणाम नहीं हैं। भले ही व्यक्तिगत रूप से कुछ सदस्यों की यह आध्यात्मिक मान्यता हो सकती है कि इसके कुछ धार्मिक परिणाम हो सकते हैं।

खतना को यौन सुख से जोड़ने पर भड़के न्यायमूर्ति अमानुल्लाह

बचाव पक्ष के वकील पाशा ने इस प्रथा की तुलना पुरुषों के खतना से की, जिस पर न्यायमूर्ति बागची ने आपत्ति जताते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर पुरुषों के सरकमसीजन और फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (mutilation) में बड़ा अंतर है। जब न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस प्रथा के उद्देश्य के बारे में पूछा, तो पाशा ने उत्तर दिया कि इसका मकसद महिलाओं के यौन सुख (सेक्सुअल प्लेजर) को बढ़ाना है। इस तर्क पर न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह तो दावे के बिल्कुल विपरीत है। न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने पाशा द्वारा इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करने पर कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें तथ्यों को सुधारने की सलाह दी।

प्रथा को न मानने पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं लगताः वकील निजाम पाशा

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल किया कि क्या दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के निर्देशों का पालन न करने पर किसी प्रकार की सजा दी जाती है? इस पर पाशा ने स्पष्ट किया कि इसका कोई सामाजिक या व्यावहारिक परिणाम नहीं होता। पाशा ने जोर दिया कि दाऊदी बोहरा धर्म में इस प्रथा को न मानने पर न तो कोई धार्मिक प्रतिबंध है और न ही बहिष्कार का डर।

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