रायपुर। शरीर के बॉयोलॉजिकल क्लॉक को नजर अंदाज कर देर रात तक कृत्रिम रौशनी में काम करने वाले एवं रौशनी में सोने वालों में हॉर्ट की बीमारी का खतरा अधिक रहता है। इसका खुलासा हालिया प्रकाशित यूरोपियन हार्ट जर्नल की नई रिपोर्ट ने कर दिया है। यूरोपियन हार्ट जर्नल दुनिया भर के हृदय रोग विशेषज्ञ एवं शोधकर्ताओं की महत्वपूर्ण संस्था है। इसके शोध को विशेषज्ञ चिकित्सक गंभीरता से लेते हैं।

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मेकाहारा में एडवांस्ड कॉर्डियक इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. स्मित श्रीवास्तव और एम्स रायपुर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. सत्यजीत सिंह ने बताया कि रात के समय कृत्रिम रौशनी में रहने से दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, क्योकि सूरज की रौशनी में शरीर का हार्मोनल इम्पेक्ट अलग होता है, रात में विशेषकर सोते समय कम रौशनी का पैमाना तय किया गया है।

इससे अधिक रौशनी शरीर के हार्मोनल एक्टिविटी को सक्रिय रखती है, जो सूरज की रौशनी में होना चाहिए। यह हार्ट अटैक की संभावना को बढ़ाती है। इसीलिए कई साल के रिसर्च के बाद यूरोपियन हार्ट जर्नल के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि रात का अंधेरा अब एक महत्वपूर्ण कार्डियोवैस्कुलर वाइटल साइन बन गया हैं, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए ब्लड प्रेशर और स्वच्छ हवा जितना ही जरूरी हैं। जैसे हम धूम्रपान या हाई बीपी पर ध्यान देते हैं, ठीक उसी तरह बेडरूम के प्रकाश पर ध्यान देना भी दिल को स्वस्थ रखने के लिए बेहद आवश्यक है।

गंभीर बीमारियों का जोखिम 10 साल के फॉलोअप में रात में तेज रोशनी में सोने वालों में हार्ट फेलियर का जोखिम 29 प्रतिशत, स्ट्रोक का जोखिम 33 प्रतिशत, हार्ट अटैक का 24 प्रतिशत, एट्रियल फाइब्रिलेशन का 15 प्रतिशत और कार्डियोवैस्कुलर मृत्यु दर का जोखिम 26 प्रतिशत अधिक पाया गया।

रिसर्च में यह बातें आई हैं सामने

11 हजार से अधिक प्रतिभागियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि रात के समय सबसे कम सक्रिय 5 घंटे में 3 लक्स से अधिक रोशनी का संपर्क भी हृदय को नुकसान पहुंचा सकता है। डॉ. सिंह के अनुसार 3 लक्स प्रकाश पूर्णिमा में चंद्रमा के प्रकाश से कुछ अधिक होता है।

हृदय के आकार पर असर सबसे अधिक रोशनी के संपर्क में रहने वाले लोगों का बायां वेंट्रिकल 2.4 प्रतिशत बड़ा, दीवारें 1.5 प्रतिशत मोटी और संकुचन क्षमता में 1.9 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।

रोशनी से दिल पर कैसे पड़ता है असर

आंख की रेटिना पर रोशनी पड़ने से मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव रुक जाता है। नींद की गुणवत्ता खराब होती है और शरीर में तनाव हार्मोन कोटिर्सोल और एड्रेनेलिन बढ़ जाते हैं। इससे शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस सूजन और बॉयोलॉजिकल क्लाब में गड़बड़ी पैदा होती हैं, जो सीधे हृदय की मांसपेशियों को कमजोर करती है।

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