हांसी: आपने गांवों में चारपाई तो बहुत देखी होंगी। लेकिन क्या कभी ऐसी चारपाई देखी है, जिसका वजन 9 क्विंटल हो? जिसकी लंबाई 18 फीट से ज्यादा हो और जिसे बनाने में 60 किलो पीतल का इस्तेमाल किया गया हो? हरियाणा के एक कारीगर ने ऐसी ही अनोखी चारपाई तैयार की है। इसकी कीमत करीब 4.25 लाख रुपये है। इसकी बुनाई में महाभारत की झलक भी दिखाई देती है।
यह अनोखी चारपाई हांसी के ढाणा खुर्द गांव में रहने वाले भोले भंडारी ने बनाई है। अब यह झज्जर जिले के सोंधी गांव में गुलिया खाप की चौपाल की शोभा बढ़ाएगी। चारपाई को तैयार करने में करीब चार महीने लगे हैं। इसकी बनावट से लेकर बुनाई तक में बारीकी का खास ध्यान रखा गया है।
18 फीट लंबी चारपाई में क्या है खास?
इस शाही चारपाई की लंबाई 18 फीट 3 इंच है। इसकी चौड़ाई 9 फीट 3 इंच और ऊंचाई करीब 4 फीट 6 इंच है। सामान्य चारपाई के मुकाबले इसका आकार काफी बड़ा है। इसे मजबूत बनाने के लिए पुरानी साल की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, इसके पायों में लाल शीशम की लकड़ी लगाई गई है।
इसकी भव्यता बढ़ाने के लिए करीब 60 किलो पीतल लगाया गया है। पायों और सीढ़ियों पर खास डिजाइन तैयार किए गए हैं। इसके पायों को अशोक स्तंभ जैसी आकृति दी गई है। यही वजह है कि यह चारपाई सामान्य ग्रामीण फर्नीचर से अलग नजर आती है।
चारपाई की बुनाई में दिखाई महाभारत की कहानी
इस चारपाई की सबसे अनोखी बात इसकी बुनाई है। इसमें महाभारत की थीम को जगह दी गई है। बुनाई में चौसर और चक्रव्यूह के डिजाइन बनाए गए हैं। इन्हें तैयार करने के लिए गुजरात के महुवा से रंगीन रेशमी रस्सियां मंगाई गईं।
कारीगर के मुताबिक, इन रस्सियों का कुल वजन करीब डेढ़ से दो क्विंटल है। इनमें 22 अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया गया है। रंगों और डिजाइन के इस मेल ने चारपाई को शाही रूप दिया है।
सामान्य चारपाई की कीमत भी 25 हजार रुपये से शुरू
भोले भंडारी केवल विशाल चारपाई ही नहीं बनाते। उनके यहां पारंपरिक चारपाइयां और बैठने के लिए पीढ़े भी तैयार किए जाते हैं। सामान्य चारपाई की कीमत करीब 25 हजार रुपये से शुरू होती है। खास डिजाइन वाली चारपाइयों की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच जाती है। वहीं, पारंपरिक पीढ़े करीब 4 हजार से 6 हजार रुपये में तैयार किए जाते हैं।
25 साल पहले पिता ने रखी थी इस काम की नींव
भोले भंडारी के परिवार में चारपाई बनाने का काम करीब 25 साल पहले शुरू हुआ था। इसकी शुरुआत उनके पिता ने की थी। परिवार के बनाए पारंपरिक सामान को पहले सूरजकुंड मेले में प्रदर्शित किया गया। वहां लोगों ने इसे पसंद किया। इसके बाद परिवार ने इस कला को आगे बढ़ाया।
धीरे-धीरे परिवार ने बड़े आकार की चारपाइयां और शाही पलंग बनाना शुरू किया। आज उनके बनाए सामान की मांग हरियाणा के अलावा दिल्ली और नोएडा तक है। परिवार के कुछ उत्पाद विदेशों तक भी पहुंच चुके हैं।
चौपाल की पुरानी पहचान को मिल रहा नया अंदाज
एक समय था, जब गांवों में चारपाई सिर्फ सोने का साधन नहीं होती थी। चौपालों पर इसी के आसपास बैठकर लोग बातचीत करते थे। बुजुर्ग गांव के मुद्दों पर चर्चा करते थे। सामाजिक फैसलों में भी चौपाल की अहम भूमिका होती थी।
बदलते समय के साथ सोफा और आधुनिक फर्नीचर घरों में आ गए। लेकिन पारंपरिक चारपाई बनाने वाले कारीगरों ने इस कला को नए रूप में पेश करना शुरू कर दिया। हांसी के भोले भंडारी की बनाई 9 क्विंटल की यह चारपाई भी इसी कोशिश का उदाहरण है। अब यह विशाल पलंग सोंधी गांव की गुलिया खाप की चौपाल में पहुंचेगा, जहां इसकी अनोखी बनावट और महाभारत की थीम लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सकती है।
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