इजरायल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हुआ है, जिसके बाद 12 साल से सत्ता पर काबिज बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ सकती है. राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट को देश की अगली सरकार बनाने की जिम्मेदारी देने का फैसला किया है. ये पश्चिम एशिया और दुनिया की राजनीति की एक बड़ी घटना है क्योंकि इससे खाड़ी में चल रहे ईरान युद्ध पर भी असर पड़ सकता है.
इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग रविवार शाम 5 बजे आइजेनकोट को सरकार बनाने का औपचारिक न्योता देंगे. अरब दलों का समर्थन सरकार बनाने में अहम साबित हो सकता है.
इजरायल में सरकार बनाने को लेकर जारी राजनीतिक खींचतान ने नया मोड़ ले लिया है. इस्राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने पूर्व सेना प्रमुख और विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट को नई सरकार बनाने का मौका दिया है. चुनाव में नेतन्याहू बहुमत खो चुके हैं, लेकिन विपक्ष के सामने भी बहुमत जुटाने की चुनौती है.
हालांकि, अरब दलों का समर्थन को लेकर देश की राजनीति में भारी विरोध है. देश के मौजूदा हालात और राजनीतिक दलों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए यह राह आसान नहीं होगी. आइजेनकोट के सामने अब छह सप्ताह के भीतर अलग-अलग राजनीतिक दलों को साथ लाकर बहुमत जुटाने की चुनौती है.
चुनाव में नेतन्याहू का धार्मिक-राष्ट्रवादी गठबंधन सबसे बड़ा राजनीतिक गुट बनकर उभरा था, लेकिन वह संसद में बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा. किसी भी गठबंधन के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का साफ समर्थन नहीं है.
इजरायल में राष्ट्रपति का पद काफी हद तक औपचारिक होता है. हालांकि, चुनाव के बाद सरकार बनाने का पहला मौका किस नेता को मिलेगा, यह तय करने में राष्ट्रपति की अहम भूमिका होती है. इसाक हर्जोग ने फैसला लेने से पहले इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में चुनी गई पार्टियों से बातचीत की.
12 साल से सत्ता पर काबिज नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है. चुनाव के बाद देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी लिकुड पार्टी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला.
इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं. इस चुनाव में नेतन्याहू के समर्थन वाले खेमे को 53 सीटें, आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें और अरब दलों को 19 सीटें मिलीं. राष्ट्रपति की ओर से बुलाई गई राजनीतिक दलों की बैठकों में 67 सांसदों ने आइजेनकोट के नाम का समर्थन किया, जबकि नेतन्याहू को केवल 46 सांसदों का समर्थन मिला.
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