Dharm Desk :- देश में त्योहारों के साथ खान-पान की अनेक अनूठी परंपराएं जुड़ी हैं। सूरत गुजरात में शरद पूर्णिमा के अगले दिन एक खास मिठाई खाने की परंपरा है। हीरे और कपड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध सूरत की पहचान में घारी ने भी अपनी अलग जगह बनाई है। यह मिठाई शहर के लोगों को अपनी परंपराओं और परिवारों से जोड़ती है। इस त्योहार को स्थानीय लोग चांदी पड़वा के नाम से जानते हैं।

इस दिन पूरे शहर में मशहूर सुरती घारी की धूम रहती है। घारी केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि सूरत की सांस्कृतिक पहचान है। जैसे इंदौर का पोहा और मुंबई का बड़ा पाव अपनी एक अलग पहचान लिए हुए है। उसी तरह घारी को सूरत की खास मिठाई कहा जाता है। चांदी पड़वा (प्रतिपदा) आते ही शहर की मिठाई की दुकानों पर घारी की मांग बढ़ जाती है। लोग इसे अपने परिवार के लिए खरीदते हैं। रिश्तेदारों व मित्रों को भी भेंट करते हैं।

क्या है सूरती घारी: कैसे तैयार की जाती है
घारी सूरत की पारंपरिक मिठाई है, जो अपने खास स्वाद और बनावट के लिए जानी जाती है। इसे आमतौर पर मैदे की बाहरी परत में मावा, घी, चीनी और मेवों का मिश्रण भरकर तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे घी में तलकर तैयार किया जाता है। आज कल बाजार में कई प्रकार की घारी आने लगी है। जिसमें चॉकलेट, स्टोवेरी, केसर, पिस्ता, बादाम से लेकर लगभग 20 तरह के फ्लेवर की घारी बाजार में उपलब्ध है। लेकिन हर साल सोने की वर्क वाली घारी देश-विदेश में सुर्खियां बटोरती है।

चांदी पड़वा पर क्यों खाते हैं घारी
चांदी पड़वा गुजरात, खासकर सूरत की एक विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा है। यह आश्विन मास की शरद पूर्णिमा के अगले दिन मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा का हिंदू धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व है। इसे चंद्रमा की पूर्ण कलाओं तथा चांदनी रात से जोड़कर देखा जाता है। सूरत में इस अवसर पर घारी के साथ भुसु यानी विभिन्न प्रकार के नमकीन खाने का भी चलन है । परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर इन व्यंजनों का आनंद लेते हैं।

कैसे शुरू हुई घारी खाने की परंपरा
घारी की शुरुआत को लेकर कई प्रचलित कहानियां हैं। इनमें एक लोकप्रिय लोकमान्यता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और तात्या टोपे से जुड़ी है। कहा जाता है कि संघर्ष के दौरान सैनिकों को ऊर्जा देने के लिए घारी जैसी पौष्टिक मिठाई दी गई थी। हालांकि, इस कहानी की ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है और घारी के आविष्कार की सटीक तारीख को लेकर भी अलग-अलग विवरण मिलते है।

सूरत की पहचान कैसे बनी घारी
घारी दूसरे शहरों में भी मिलती है, लेकिन चांदी पड़वा पर इसे खाने की विशेष परंपरा सूरत गुजरात को इससे खास तौर पर जोड़ती है। त्योहार के दिनों में मिठाई की दुकानों पर इसकी मांग बढ़ती है और सूरत से बाहर रहने वाले लोग भी इसे अपने परिवारों के लिए मंगवाते हैं।