Dharm Desk- संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना से मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत इस बार रविवार 1 नवंबर को रखा जाएगा। कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व का उत्तर भारत में विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन माताएं पूरे दिन व्रत रखकर अहोई माता की पूजा करती हैं और अपनी संतान के सुखी, स्वस्थ एवं मंगलमय जीवन की प्रार्थना करती हैं। संतान प्राप्ति की कामना से भी कई महिलाएं यह व्रत करती हैं।

अहोई अष्टमी तिथि और शुभ मुहूर्त

अहोई अष्टमी की अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2:51 से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1: 10 मिनट तक रहेगी। अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5.36 मिनट से 6.54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान माताएं विधि-विधान से पूजा कर सकती हैं।

दीवार पर बनाती हैं अहोई माता का चित्र

व्रत के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर संतान के कल्याण का संकल्प लेती हैं और अपनी परंपरा के अनुसार दिनभर व्रत रखती हैं। शाम को पूजा स्थल की सफाई कर दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है या बाजार से लाया गया चित्र स्थापित किया जाता है। चित्र में सेई और उसके बच्चों को भी दर्शाने की परंपरा है। कुछ परिवारों में चांदी की अहोई जिसे स्याऊ भी कहते है उसकी पूजा की जाती है। पूजा के समय रोली, अक्षत, फूल, दीपक, जल और मिठाई आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनी जाती है और संतान की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।

अहोई माता कौन है

अहोई अष्टमी पर मुख्य रूप से अहोई माता की पूजा की जाती है।अहोई माता को माता पार्वती का स्वरूप मानते है। उनकी आराधना संतान की रक्षा, लंबी उम्र और कल्याण के लिए की जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत करने से माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

तारों को अर्घ्य देकर पूरा होता है व्रत

शाम को तारे दिखाई देने पर उनकी पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद महिलाएं व्रत खोलती हैं। कुछ परिवारों में चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी होती है।