प्रयागराज. उत्तर प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही की शिकायतों के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिंता जताई है. न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने राज्य सरकार को शिकायत दर्ज कराने और उसकी जांच की प्रक्रिया तय करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है. सरकार को तीन सप्ताह में SOP कोर्ट में पेश करनी होगी. मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी.
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याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई स्थिति
कोर्ट एकांश वर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष कोर्ट में मौजूद रहे. अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी प्रयागराज डॉ. अभिषेक सिंह का हलफनामा पेश किया. इसमें बताया गया कि प्रदेश में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010 और उत्तर प्रदेश क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स नियमावली, 2019 लागू है.
मेडिकल बोर्ड से जांच का है प्रावधान
हलफनामे के मुताबिक, चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञों, जिला मेडिकल बोर्ड और जरूरत पड़ने पर राज्य मेडिकल बोर्ड से कराने का प्रावधान है. हालांकि, कोर्ट ने माना कि शिकायत दर्ज कराने के शुरुआती चरण को लेकर व्यवस्था स्पष्ट नहीं है.
‘पीड़ित को दर-दर भटकना पड़ता है’
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है, जिससे पीड़ित को यह पता हो कि शिकायत सबसे पहले किस नामित अधिकारी के पास करनी है. कोर्ट के मुताबिक, बाध्यकारी व्यवस्था नहीं होने से पीड़ित को शिकायत के लिए अलग-अलग जगह भटकना पड़ता है और आखिर में न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख करना पड़ सकता है.
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कृषक दुर्घटना योजना पर भी अहम टिप्पणी
लखनऊ खंडपीठ ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से जुड़े एक अन्य मामले में कहा कि परिवार के एक अभिभावक की मृत्यु पर पांच लाख रुपये का मुआवजा मिलने के बाद दूसरे अभिभावक की दुर्घटना में मृत्यु होने पर नया दावा सिर्फ इसी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि योजना का लाभ प्रत्येक पात्र दुर्घटना मृत्यु के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए.


