लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सुलतानपुर के 46 साल पुराने सामूहिक हत्याकांड में दो दोषियों की उम्रकैद की सजा निरस्त कर दी है. घटना के समय दोनों की उम्र 18 साल से कम थी. कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी है, लेकिन सजा तय करने के लिए मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया है.
इसे भी पढ़ें- UP PET 2026: किसी को 520 तो किसी को 650 किमी दूर मिला सेंटर, छात्रों में भारी गुस्सा
1980 में हमले में चार लोगों की हुई थी मौत
यह मामला 28 सितंबर 1980 का है. सुलतानपुर में पुरानी रंजिश के चलते आठ आरोपियों ने धारदार हथियारों और भालों से हमला किया था. घटना में शमशाद, अब्दुल रफीक, दिलशेर और हामिद उल्लाह की मौत हो गई थी. हमले में कई अन्य लोग घायल भी हुए थे. सत्र न्यायालय ने 14 दिसंबर 1981 को आठ आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
दोनों दोषियों ने उम्र को लेकर दी थी दलील
हाईकोर्ट में सिराज अहमद और अब्दुल वाहिद ने दावा किया कि वारदात के समय वे नाबालिग थे. कोर्ट के निर्देश पर किशोर न्याय बोर्ड ने उनकी उम्र की जांच की. बोर्ड की रिपोर्ट और शैक्षिक दस्तावेजों से पता चला कि घटना के समय सिराज की उम्र 17 साल 10 महीने थी. वहीं, अब्दुल वाहिद की उम्र 17 साल 11 महीने थी.
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को माना पर्याप्त
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, अन्य गवाहों की गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य एक-दूसरे के अनुरूप हैं. अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा. इसलिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है.
इसे भी पढ़ें- ‘रक्तबीज’ जैसे माफिया-दंगाइयों का अंत, अब नाइट शिफ्ट में भी निडर होकर काम कर रहीं महिलाएं: योगी
छह सप्ताह में फैसला करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना के समय दोनों के किशोर होने के कारण उनकी सजा सामान्य आपराधिक कानून के तहत बरकरार नहीं रखी जा सकती. अब किशोर न्याय कानून के प्रावधानों के अनुसार उनकी सजा तय होगी. कोर्ट ने किशोर न्याय बोर्ड को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के छह सप्ताह के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है. इस तरह कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा के सवाल को अलग-अलग माना है.

