कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश के संस्कारधानी जबलपुर से इंसानियत और संवेदनाओं को झकझोर देने वाली एक बेहद प्रेरणादायक खबर सामने आई है। सड़क हादसे में ब्रेन डेड घोषित किए गए 40 वर्षीय नरेंद्र रजक के परिजनों ने दुख की इस घड़ी में एक बड़ा और साहसिक फैसला लेते हुए उनके अंगदान करने का निर्णय लिया। इसके बाद शहर में दो ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए, जिसके जरिए उनके अंगों को सकुशल अस्पताल और एयरपोर्ट तक पहुंचाया गया। इस महादान से पाँच गंभीर रूप से बीमार मरीजों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जग गई है।
सड़क हादसे में ब्रेन डेड हुए थे नरेंद्र रजक
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मूल रूप से निजी कंपनी में काम करने वाले 40 वर्षीय नरेंद्र रजक एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड (Brain Dead) घोषित कर दिया। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन ऐसे कठिन समय में उनकी पत्नी पूजा रजक और अन्य परिजनों ने मिसाल पेश करते हुए अंगदान करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। परिजनों की इस सहमति के बाद अस्पताल प्रशासन ने तुरंत अंगदान की प्रक्रिया शुरू की।
बनाए गए दो ग्रीन कॉरिडोर, अंगों को किया गया रवाना
अंगों को समय पर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने के लिए जबलपुर प्रशासन और पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दो ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण किया।
पहला ग्रीन कॉरिडोर: मेट्रो हॉस्पिटल से लेकर डुमना एयरपोर्ट तक बनाया गया।
दूसरा ग्रीन कॉरिडोर: मेट्रो हॉस्पिटल से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज तक बनाया गया। अहमदाबाद तक पहुंचा लीवर। परिजनों की सहमति से नरेंद्र रजक के दो किडनियां, लिवर, आंखें और स्किन (त्वचा) दान किए गए।
लिवर अहमदाबाद रवाना
अहमदाबाद से विशेष रूप से डॉक्टरों की एक टीम चार्टर्ड विमान लेकर जबलपुर पहुँची थी। ग्रीन कॉरिडोर की मदद से लिवर को सुरक्षित रूप से एयरपोर्ट पहुँचाया गया, जहाँ से टीम चार्टर्ड विमान के जरिए उसे लेकर अहमदाबाद रवाना हो गई।
किडनी प्रत्यारोपण, हार्ट प्रत्यारोपण नहीं हो सका
दान की गई एक किडनी मेट्रो हॉस्पिटल में ही भर्ती एक अन्य मरीज को लगाई जाएगी, जबकि दूसरी किडनी नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज को भेजी गई है। डॉक्टरों के मुताबिक, तकनीकी कारणों (हार्ट खराब होने) के चलते हृदय का प्रत्यारोपण नहीं किया जा सका। अंगदान की इस संवेदनशील घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मृत्यु के बाद भी इंसान दूसरों के जीवन में जीवित रह सकता है। इस सराहनीय कदम के लिए हर तरफ नरेंद्र रजक के परिवार की दरियादिली की प्रशंसा की जा रही है।
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