सुप्रीम कोर्ट की उच्चाधिकार समिति के दौरे में ग्रामीणों ने उठाए गंभीर सवाल, भूजल संकट और वन्यजीवों के अस्तित्व पर जताई चिंता
गुलशन कुमार | नारनौल
महेंद्रगढ़/चरखी दादरी। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर दक्षिण हरियाणा में खनन गतिविधियों पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित उच्चाधिकार समिति के 27 अक्टूबर 2026 को चरखी दादरी और महेंद्रगढ़ जिलों के दौरे के दौरान ग्रामीणों ने खनन से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान, गिरते भूजल स्तर और वन भूमि के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। महेंद्रगढ़ के राजावास गांव में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि संरक्षित वन घोषित की गई जमीन के एक बड़े हिस्से को पत्थर खनन और क्रशिंग के लिए ई-नीलामी पर चढ़ाया गया। वहीं, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने अरावली क्षेत्र में खनन पर सख्ती से रोक लगाने और प्राकृतिक पर्यावासों को बचाने की मांग की।
संरक्षित वन की जमीन खनन के लिए नीलाम करने का आरोप
महेंद्रगढ़ जिले के राजावास गांव में आयोजित जनसंवाद के दौरान ग्रामीण सत्यनारायण ने समिति के सामने वन भूमि और खनन से जुड़ा मामला उठाया। उनके मुताबिक, हरियाणा सरकार के 20 जून 2023 के राजपत्र में ‘निकोबार स्वैप’ के तहत राजावास की 506.33 एकड़ भूमि को भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अंतर्गत संरक्षित वन घोषित किया गया था।
ग्रामीण ने आरोप लगाया कि इसी दिन इस भूमि के 119.55 एकड़ हिस्से को पत्थर खनन और क्रशिंग के लिए ई-नीलामी पर डाल दिया गया। यह कुल भूमि का लगभग 24 प्रतिशत हिस्सा बताया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि ग्राम पंचायत को विश्वास में लिए बिना संरक्षित वन क्षेत्र में खनन की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ाई गई।
ग्रामीणों ने समिति से इस मामले की जांच कराने और कथित नीलामी को रद्द करने की सिफारिश करने की मांग की।
1,500 से 2,000 फीट नीचे पहुंचा भूजल स्तर होने का दावा
राजावास के ग्रामीणों ने क्षेत्र में गहराते जल संकट पर भी चिंता जताई। सत्यनारायण के अनुसार, गांव और आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर 1,500 से 2,000 फीट तक नीचे पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि सतनाली ब्लॉक भूजल दोहन के लिहाज से गंभीर स्थिति में है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस क्षेत्र में खनन बढ़ने से जल स्रोतों, खेती और प्राकृतिक पर्यावरण पर और प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उन्होंने खसरा नंबर 99 में स्थित गांव के मुख्य तालाब का भी उल्लेख किया। ग्रामीणों के अनुसार, इस तालाब को केंद्र सरकार की अटल भूजल योजना के तहत नहर से जोड़ने का काम चल रहा है।
उनका तर्क है कि आसपास खनन गतिविधियां जारी रहने से जल संरक्षण के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।
20 से अधिक गांवों में फैली अरावली श्रृंखला को संरक्षित करने की मांग
ग्रामीणों ने राजावास क्षेत्र में फैली लगभग 15 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला को संरक्षण के दायरे में लाने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र दुर्लभ रस्टी-स्पॉटेड कैट, तेंदुए, लकड़बग्घे, साही और गोह समेत कई वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है।
ग्रामीणों ने मांग की कि इस क्षेत्र को कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करने की सिफारिश की जाए। साथ ही, भूजल संकट से जूझ रहे और पौधरोपण वाले इलाकों में खनन पर रोक लगाने संबंधी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की सिफारिशों को लागू कराया जाए।
उन्होंने पड़ोसी उष्मापुर गांव में चल रही खनन गतिविधियों और स्टोन क्रशरों को भी बंद कराने की मांग उठाई। ग्रामीणों का आरोप है कि इन गतिविधियों से जंगलों, भूजल, वायु गुणवत्ता और कृषि भूमि को नुकसान पहुंच रहा है।
खनन राजस्व बढ़ने के साथ पर्यावरणीय नुकसान पर सवाल
अरावली विरासत जन अभियान की सह-संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने समिति के दौरे को ग्रामीणों की समस्याएं सामने रखने की दिशा में सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि दक्षिण हरियाणा के कई इलाकों में अरावली और उससे जुड़े प्राकृतिक पर्यावासों पर खनन का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
अहलूवालिया के मुताबिक, पिछले एक दशक में हरियाणा सरकार का खनन राजस्व 7,060 प्रतिशत तक बढ़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस आर्थिक वृद्धि की पर्यावरणीय कीमत चरखी दादरी और भिवानी समेत दक्षिण हरियाणा के कई क्षेत्रों को चुकानी पड़ रही है, जहां खनन गतिविधियों के कारण पहाड़ियों और प्राकृतिक वनस्पति को नुकसान पहुंचा है।
उन्होंने वर्ष 2021 के लैंड डिग्रेडेशन एटलस का हवाला देते हुए कहा कि हरियाणा की लगभग 3.60 लाख हेक्टेयर भूमि, यानी करीब 8 प्रतिशत क्षेत्र, भूमि क्षरण से प्रभावित बताया गया है। उनके अनुसार, वनस्पति का विनाश और खनन जैसी गतिविधियां भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण की समस्या को गंभीर बना सकती हैं।
हरियाणा में वन क्षेत्र कम, फिर भी प्राकृतिक पर्यावासों पर दबाव
नीलम अहलूवालिया ने हरियाणा में कम वन क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य के प्राकृतिक पर्यावासों को बचाना बेहद जरूरी है। उन्होंने राजावास जैसे इलाकों में धोक और जाल के पेड़ों से समृद्ध वनस्पति तथा वन्यजीवों के आवास पर खनन और स्टोन क्रशरों से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी क्षेत्र को संरक्षित वन घोषित किया जाता है, तो वहां खनन संबंधी फैसलों में संरक्षण के उद्देश्य को सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती। उनके अनुसार, पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों को केवल राजस्व के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।

समिति से की गईं ये प्रमुख मांगें
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों और ग्रामीणों ने उच्चाधिकार समिति से कई महत्वपूर्ण सिफारिशें करने की मांग की है। इनमें शामिल हैं:
- महेंद्रगढ़ के जल संकटग्रस्त और भूजल के अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश।
- राजावास की संरक्षित वन भूमि से जुड़ी कथित ई-नीलामी की जांच और उसे रद्द करने पर विचार।
- लीज की निर्धारित सीमा से बाहर खुदाई करने और भूजल स्तर को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की जांच कर दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई।
- खनन, स्टोन क्रशरों, सीमेंट प्लांटों और कचरा डंपिंग से अरावली को हुए नुकसान का सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी आकलन।
- संवेदनशील खनन क्षेत्रों और अंतरराज्यीय सीमाओं पर नियमित, विशेषकर साप्ताहिक, ड्रोन निगरानी की व्यवस्था।
- निर्माण कार्यों में वैकल्पिक सामग्रियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना, ताकि प्राकृतिक पहाड़ियों से पत्थरों के दोहन पर निर्भरता कम हो।
- राजावास और आसपास की अरावली श्रृंखला को संरक्षण के दायरे में लाने के प्रस्ताव पर विचार।
अरावली का संरक्षण और ग्रामीणों की आजीविका बड़ा सवाल
दक्षिण हरियाणा में अरावली संरक्षण का मुद्दा केवल पहाड़ियों और जंगलों तक सीमित नहीं है। इससे भूजल, खेती, ग्रामीण आजीविका, वायु गुणवत्ता और वन्यजीवों का अस्तित्व भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि खनन गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है।
अब इस दौरे के बाद निगाहें उच्चाधिकार समिति की सिफारिशों और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई पर टिकी हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार होगा और अरावली के संवेदनशील क्षेत्रों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
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