टुकेश्वर लोधी, आरंग। एक तरफ पूरा छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के जश्न में डूबा है, सरकारी इमारतें रंग-बिरंगी रोशनी और झालरों से जगमगा रही हैं, तो दूसरी तरफ राज्य के स्वप्नद्रष्टा और भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा खुद अपने ही बनाए राज्य में उपेक्षा के घोर अंधेरे में खड़ी है। आरंग नगर पालिका क्षेत्र के कलई रोड स्थित ‘अटल परिसर’ की बदहाली स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता की पोल खोल रही है। बीते कई दिनों से पूरा परिसर घने अंधेरे में डूबा हुआ है, लेकिन राज्योत्सव की पूर्व संध्या पर भी किसी जिम्मेदार अधिकारी या जनप्रतिनिधि ने यहां की सुध लेने की ज़हमत नहीं उठाई।

30 लाख का बजट, 10 महीने में ही ‘उजाड़’
गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी नगरीय निकायों में लाखों रुपये की लागत से ‘अटल परिसर’ का निर्माण कराया गया था। आरंग में भी लगभग 30 लाख रुपये की लागत से इस परिसर को संवारा गया था, लेकिन विडंबना देखिए कि महज 10 महीनों के भीतर ही यह परिसर रख-रखाव के अभाव में बदहाल और उजाड़ हो गया। निर्माण कार्य कराकर राज्य सरकार और स्थानीय निकाय इसे पूरी तरह भूल चुके हैं।

जयंती और पुण्यतिथि तक सीमित ‘श्रद्धा’
आरंग वासियों का कहना है कि महापुरुषों की प्रतिमाएं और उनके नाम पर बने परिसर सिर्फ जयंती और पुण्यतिथि पर ही नेताओं और अधिकारियों को याद आते हैं। उस दिन माल्यार्पण कर तस्वीरें खिंचवाने की होड़ मचती है और बाकी पूरा साल प्रतिमाएं धूल फांकती रहती हैं, जिस महान नेता ने छत्तीसगढ़ के करोड़ों लोगों के सपने को साकार करते हुए अलग राज्य की सौगात दी, उनकी प्रतिमा के समक्ष राज्योत्सव की पूर्व संध्या पर एक दीया तक न जलना, प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

जनता पूछ रही सवाल: क्या यही है सच्चा सम्मान ?
रोशनी के इस पर्व और राज्योत्सव के मौके पर अटल परिसर का अंधेरे में डूबा होना हर उस छत्तीसगढ़िया के दिल को कचोट रहा है, जो अटल जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है।
क्या लाखों रुपये केवल लोक-दिखावे के लिए पानी की तरह बहाए गए थे..?

क्या जिम्मेदारों का फर्ज सिर्फ निर्माण कराने तक ही सीमित है, उनके रख-रखाव की कोई जवाबदेही नहीं..?
नगरवासियों ने मांग की है कि परिसर में तत्काल प्रकाश व्यवस्था बहाल की जाए और बदहाल पड़े अटल परिसर की सुध ली जाए, ताकि ‘राज्य निर्माता’ का सम्मान केवल बयानों और पोस्टरों तक सीमित न रहे।
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