उत्तर प्रदेश सरकार संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद स्वतः नामांतरण की व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम कर रही है. इसके लिए यूनिक प्रॉपर्टी आईडी, डिजिटल रिकॉर्ड और विभागों के बीच डेटा साझा करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा रहा है.

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद नामांतरण की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए राज्य सरकार स्वतः नामांतरण की व्यवस्था विकसित करने की तैयारी कर रही है. इसके तहत रजिस्ट्री से संबंधित जानकारी ऑनलाइन संबंधित विभागों तक पहुंचाने की योजना है, ताकि लोगों को नामांतरण और रिकॉर्ड अपडेट कराने के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें.

यूनिक प्रॉपर्टी आईडी पर जोर

सोमवार को मुख्य सचिव एसपी गोयल की अध्यक्षता में हुई बैठक में यूनिक प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था की समीक्षा की गई. बैठक में बताया गया कि प्रदेश में अलग-अलग श्रेणियों की संपत्तियों की पहचान और उनके रिकॉर्ड के प्रबंधन के लिए विभिन्न विभाग काम कर रहे हैं.

कृषि भूमि की पहचान के लिए खसरा संख्या आधारित यूनिक प्रॉपर्टी आईडी उपलब्ध है. आबादी की जमीन के लिए 13 अंकों की यूनिक प्रॉपर्टी आईडी यानी घरौनी तैयार की जा रही है, जबकि आवास और औद्योगिक विकास विभाग भी अपने क्षेत्र की संपत्तियों की पहचान के लिए आईडी तैयार कर रहे हैं.

ई-नगरसेवा पर 56.57 लाख संपत्तियां

बैठक में नगर विकास विभाग ने ई-नगरसेवा पोर्टल पर दर्ज संपत्तियों का ब्योरा प्रस्तुत किया. अधिकारियों के अनुसार, प्रदेश के 75 जिला मुख्यालयों के नगर निकायों में इस पोर्टल पर पहले 34.70 लाख संपत्तियां दर्ज थीं और उनके लिए 17 अंकों की यूनिक प्रॉपर्टी आईडी बनाने का काम चल रहा था.

बैठक में यह भी बताया गया कि कुल 75 में से 71 नगर निकायों में आईडी बनाने का काम हो चुका है. पोर्टल पर दर्ज संपत्तियों की कुल संख्या 56.57 लाख बताई गई. इसके साथ ही शहरी संपत्तियों की पहचान से जुड़ी नक्शा परियोजना की प्रगति की भी समीक्षा हुई.

10 निकायों में नक्शा परियोजना

नक्शा परियोजना के पायलट चरण के लिए 10 नगर निकायों का चयन किया गया है. इनमें से पांच निकायों- गोरखपुर नगर निगम, झांसी नगर निगम, नगर पालिका परिषद नवाबगंज (बाराबंकी), हरदोई और चित्रकूटधाम में ई-नगरसेवा तथा नक्शा परियोजना, दोनों की यूनिक प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था लागू की जानी है.

इस परियोजना का उद्देश्य प्रत्येक संपत्ति के लिए अर्बन प्रॉपर्टी कार्ड तैयार करना है. इससे संपत्ति के वैधानिक स्वामित्व की पुष्टि करने में मदद मिलेगी. चयनित 10 नगर निकायों में परियोजना का काम पूरा करने के लिए 31 दिसंबर 2026 की समयसीमा तय की गई है.

संपत्ति कर और स्वामित्व का अंतर

बैठक में स्पष्ट किया गया कि ई-नगरसेवा पोर्टल पर बनाई जाने वाली 17 अंकों की आईडी का उपयोग संपत्ति कर के निर्धारण और वसूली के लिए किया जाता है. वहीं, नक्शा परियोजना के तहत बनने वाला अर्बन प्रॉपर्टी कार्ड संपत्ति के स्वामित्व की जानकारी देने में सहायक होगा.

दोनों व्यवस्थाओं के बीच समन्वय के लिए राज्य स्तर के ई-नगरसेवा डेटाबेस और केंद्र स्तर के नक्शा डेटाबेस को एपीआई के माध्यम से सीधे जोड़ने की व्यवस्था की गई है.

स्वामित्व के दस्तावेज होंगे चिह्नित

संपत्ति की खरीद-बिक्री के दौरान स्वामित्व की पुष्टि के लिए मान्य दस्तावेजों की पहचान पर भी बैठक में चर्चा हुई. ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति बेचने के अधिकार की प्रथम दृष्टया पुष्टि के लिए खतौनी और घरौनी को मान्य अभिलेख के रूप में चिह्नित किया गया है.

नगर विकास, आवास एवं शहरी नियोजन और औद्योगिक विकास विभागों को भी अपने-अपने क्षेत्र में संपत्ति बेचने के अधिकार की पुष्टि के लिए मान्य दस्तावेजों की पहचान करने को कहा गया है. आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अनुसार, विकास प्राधिकरणों, परिषदों और अन्य संस्थाओं की ओर से आवंटित संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज उनके रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं.

ऐसे मामलों में आवंटन पत्र, रजिस्ट्री, बैनामा और लीज डीड स्वामित्व के साक्ष्य हो सकते हैं. संबंधित विभागों को अपने क्षेत्राधिकार के अनुसार इन दस्तावेजों की पहचान कर स्पष्ट व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए गए हैं.

ऑनलाइन रिकॉर्ड के लिए बनेगी एसओपी

राजस्व अभिलेखों के ऑनलाइन प्रमाणीकरण, अपडेट और एकीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार की जाएगी. इसमें यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि अभिलेखों में विवाद होने या जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर किस प्रक्रिया का पालन किया जाएगा.

इस संबंध में महानिरीक्षक निबंधन, उत्तर प्रदेश की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जा चुकी है. इसमें राजस्व परिषद और राजस्व विभाग के सक्षम अधिकारियों को भी शामिल किया जाना है.

समिति अपनी रिपोर्ट राजस्व परिषद को सौंपेगी. इसके बाद राजस्व विभाग आवश्यक एसओपी तैयार करेगा, जबकि अन्य विभागों को भी अपने स्तर पर प्रक्रिया निर्धारित करने के निर्देश दिए गए हैं.

प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य संपत्ति रिकॉर्ड को अधिक व्यवस्थित करना और विभागों के बीच डिजिटल जानकारी साझा करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना है. स्वतः नामांतरण की व्यवस्था लागू होने पर रजिस्ट्री के बाद नामांतरण के लिए अलग से आवेदन करने और रिकॉर्ड अपडेट कराने में लोगों की परेशानी कम हो सकती है.