Automobile desk: भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में ग्राहकों की पसंद और प्राथमिकताओं में अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक जब भी कोई नया वाहन खरीदने शोरूम जाता था, तो खरीदार के सामने मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल इंजन के विकल्प ही होते थे। हालांकि, ईंधन की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और कड़े होते पर्यावरण नियमों के बीच अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

आज के समय में हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक और सीएनजी गाड़ियां खरीदारों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं, जिसके चलते कार निर्माताओं को अपनी पुरानी रणनीतियों को छोड़कर पूरी तरह से नए सिरे से योजनाएं तैयार करनी पड़ रही हैं।

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन यानी FADA के हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो बाजार के इस रुख का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 के दौरान कुल कार बिक्री में सिर्फ पेट्रोल से चलने वाले वाहनों की हिस्सेदारी घटकर 41 प्रतिशत पर आ गई है, जबकि ठीक एक साल पहले सितंबर 2025 में यह आंकड़ा 47 प्रतिशत हुआ करता था। इसके विपरीत, सीएनजी, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों की संयुक्त हिस्सेदारी में जबरदस्त उछाल आया है और यह आंकड़ा 35 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 41 प्रतिशत पर पहुंच गया है। ऑटो सेक्टर के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव इस बात का सबूत है कि खरीदार अब केवल एक पारंपरिक ईंधन विकल्प तक सीमित नहीं रहना चाहते हैं।

वैश्विक वाहन निर्माता कंपनियां भी भारतीय बाजार की इस नब्ज को बखूबी समझ रही हैं। रेनॉल्ट और वोक्सवैगन ग्रुप जैसे दिग्गज ब्रांड्स अब अपनी आने वाली गाड़ियों में इलेक्ट्रिक के साथ-साथ सीएनजी और अन्य उन्नत विकल्पों को शामिल करने पर विशेष जोर दे रहे हैं। रेनॉल्ट ग्रुप इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टेफनी डेबलेस का कहना है कि भारतीय बाजार के बड़े हिस्से पर पकड़ बनाने के लिए केवल नए मॉडल लॉन्च करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही जरूरी है कि गाड़ी सही इंजन और ईंधन विकल्प के साथ बाजार में उतारी जाए। कंपनी अपनी आगामी डस्टर और अन्य लोकप्रिय मॉडलों के जरिए आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय कार बाजार के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से तक अपनी पहुंच बनाने की योजना पर काम कर रही है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में ग्राहकों की मांग और भौगोलिक परिस्थितियां भी इन विकल्पों को तय करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। उदाहरण के तौर पर, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में होने वाली कुल कार बिक्री में अकेले सीएनजी मॉडलों की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत तक है। ऐसे बाजारों में यदि किसी निर्माता के पास सीएनजी का विकल्प उपलब्ध न हो, तो वह एक बहुत बड़े ग्राहक वर्ग तक पहुंचने में असफल हो जाता है। यही मुख्य वजह है कि वाहन निर्माता कंपनियां अब केवल एक या दो इंजन विकल्पों पर निर्भर रहने की बजाय हर सेगमेंट में विविधीकरण यानी मल्टी-पावरट्रेन मॉडल उतारने की तैयारी कर रही हैं।

स्टेलेंटिस और स्कोडा के नेतृत्व वाला वोक्सवैगन ग्रुप भी इसी दिशा में अपने कदम तेजी से आगे बढ़ा रहा है। स्टेलेंटिस इंडिया के प्रबंध निदेशक शैलेश हजेला के अनुसार, कंपनी अपने वैश्विक पोर्टफोलियो का लाभ उठाते हुए ए से लेकर डी सेगमेंट तक की कारों में पेट्रोल-डीजल के अलावा हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक विकल्पों की पूरी श्रृंखला पेश करने की योजना बना रही है। कंपनी आने वाले समय में कई नए मॉडल और बड़े अपडेट भारतीय सड़कों पर उतारने की तैयारी में जुटी है। इसी तरह, महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी अपने पोर्टफोलियो का विस्तार करते हुए हाल ही में फैक्ट्री-फिटेड सीएनजी सेगमेंट में अपनी लोकप्रिय एक्सयूवी 3एक्सओ का जेडएनजी वेरिएंट उतारा है, जिसे ग्राहकों की तरफ से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

दूसरी ओर, टोयोटा किर्लोस्कर मोटर का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में हर राज्य की भौगोलिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं, इसलिए हर जगह एक ही तकनीक सफल नहीं हो सकती। टोयोटा के अधिकारी सबरी मनोहर के अनुसार, कंपनी अलग-अलग तकनीकों पर एक साथ काम करने की रणनीति पर चल रही है और जिन क्षेत्रों में सीएनजी आसानी से मिल जाती है, वहां इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। इन बदलते रुझानों को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले समय में वाहन खरीदते समय केवल गाड़ी का डिजाइन या शुरुआती कीमत ही नहीं, बल्कि ईंधन का खर्च, मेंटेनेंस और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विकल्प सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।