Bastar News Update : जगदलपुर. बस्तर दशहरा में रथ खींचने की परंपरा जितनी अनूठी है, उतना ही दिलचस्प है विजय रथ की चोरी का विधान. हजारों लोगों की मौजूदगी के बीच माड़िया आदिवासी विजय रथ को चुराकर कुमड़ाकोट जंगल ले जाते हैं. शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर रथ को ले जाने के पीछे सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा जुड़ी हुई है. मान्यता के अनुसार, पहले रथ खींचने वाले आदिवासियों को राजा के साथ बैठने और भोजन करने का अवसर नहीं मिलता था. इसे अपने सम्मान से जोड़कर ग्रामीणों ने रथ चोरी की परंपरा शुरू की. भीतर रैनी के दिन मावली माता की परिक्रमा के बाद आठ पहियों वाले विजय रथ को कुमड़ाकोट ले जाया जाता है. इसके बाद राज परिवार को रथ चोरी की सूचना दी जाती है और उसे वापस लाने की प्रक्रिया शुरू होती है. बाहर रैनी के दिन राज परिवार कुमड़ाकोट पहुंचकर लाड़ी यानी पारंपरिक झोपड़ी में नवाखानी का विधान निभाता है. इस दौरान ग्रामीणों के साथ प्रसाद ग्रहण करने और उनका कुशलक्षेम पूछने की परंपरा भी निभाई जाती है. इसके बाद माता दंतेश्वरी के छत्र को रथ पर विराजित कर राज परिवार सात परिक्रमा करता है. फिर विजय रथ को वापस राजमहल के सामने लाया जाता है. बस्तर दशहरा की यह परंपरा केवल रथ की वापसी नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और आदिवासी सम्मान का संदेश भी देती है.
Bastar News Update : 1700 से ज्यादा देवी-देवताओं की विदाई की तैयारी
जगदलपुर. 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में देवी-देवताओं का आगमन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही विशेष है उनकी विदाई का विधान. इस वर्ष बस्तर संभाग और सीमावर्ती ओडिशा के गांवों से 1700 से अधिक देवी-देवता जगदलपुर पहुंचे हैं. इनके साथ करीब सात हजार सेवादार भी दशहरा की विभिन्न रस्मों में भाग लेने आए हैं. माता मावली के परघाव के साथ आमंत्रित देवी-देवताओं की उपस्थिति ने दशहरा की परंपराओं को विशेष स्वरूप दिया है. अब 24 अक्टूबर को आयोजित होने वाली कुटुंब जात्रा में इन देवी-देवताओं को अगले वर्ष फिर आने के निमंत्रण के साथ विदाई दी जाएगी. गंगामुंडा स्कूल परिसर में होने वाले इस आयोजन में परंपरागत रूप से भेंट सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है. देवी-देवताओं की श्रेणी और परंपरा के अनुसार विदाई की व्यवस्थाएं की जाती हैं. इन सभी व्यवस्थाओं के पीछे सदियों से चली आ रही सामुदायिक भागीदारी की परंपरा जुड़ी हुई है. जिला प्रशासन की ओर से आमंत्रित देवी-देवताओं और उनके सेवादारों के ठहरने की व्यवस्था की जाती है. पुराने तहसील कार्यालय स्थित भंडारगृह से पूजन सामग्री और राशन भी वितरित किया जा रहा है. राजा दलपत देव के शासनकाल से चली आ रही इस परंपरा को बस्तर की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है. कुटुंब जात्रा के जरिए बस्तर दशहरा में शामिल देवी-देवताओं को सम्मानपूर्वक विदाई देकर अगले वर्ष फिर आमंत्रित किया जाएगा.
305 साल से प्रज्वलित हो रही मां अन्नपूर्णा की ज्योति
जगदलपुर. बस्तर दशहरा की भव्यता के पीछे केवल रथ और धार्मिक रस्में ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी भंडार व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जगदलपुर में स्थित दशहरा के भंडारगृह में मां अन्नपूर्णा के नाम से ज्योति प्रज्वलित करने की परंपरा करीब 305 वर्षों से चली आ रही है. इस ज्योति के जरिए दशहरा के दौरान अन्न और आवश्यक सामग्री की कमी नहीं होने की कामना की जाती है. रियासतकाल में मांझी और चालकी को दिए गए निर्देशों के अनुसार ग्रामीण राज परिवार को चावल, दाल और अन्य सामग्री भेंट करते थे. इस परंपरा में दी जाने वाली सामग्री को टाकोली और नकद राशि को बिसहा पैसा कहा जाता था. ग्रामीणों से प्राप्त सामग्री को एक स्थान पर सुरक्षित रखा जाता था, जिसे भंडार कहा जाता था. इस व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति को भंडारी के नाम से जाना जाता था. भंडारगृह में मां अन्नपूर्णा की पूजा और ज्योति प्रज्वलित करने का विधान आज भी दशहरा की परंपराओं से जुड़ा हुआ है. वर्तमान में भी आमंत्रित देवी-देवताओं के साथ आने वाले सेवादारों को यहां से पूजन सामग्री और राशन उपलब्ध कराया जा रहा है. इस व्यवस्था से बस्तर दशहरा में शामिल होने वाले हजारों लोगों की धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलती है. 305 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा ग्रामीणों की भागीदारी और सामुदायिक सहयोग की मिसाल है. बस्तर दशहरा का यह भंडारगृह आज भी आस्था, अन्न और परंपरा के आपसी संबंध को जीवंत बनाए हुए है.
जमीन, पुनर्वास और सूखा राहत पर ग्रामीणों का आक्रोश
सुकमा. कोंटा ब्लॉक के अंदरूनी गांवों में बुनियादी सुविधाओं और जमीन से जुड़े मुद्दों को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश सामने आया है. ग्राम पंचायत गंगलेर में बस्तरिया राज मोर्चा के नेतृत्व में आयोजित आमसभा में हजारों ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं रखीं. गंगलेर, सिंगाराम, गोल्लापल्ली, माराईगुड़ा और किस्टाराम पंचायतों के ग्रामीणों ने वन अधिकार पट्टे नहीं मिलने पर नाराजगी जताई. ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत की अनुमति के बिना पुश्तैनी खेती की जमीन पर सीपीटी कार्य के नाम पर खुदाई की गई. उन्होंने पात्र परिवारों को वन अधिकार पट्टे देने और उनकी आजीविका से जुड़े सवालों का समाधान करने की मांग उठाई. पोलावरम परियोजना से प्रभावित होने वाले 18 गांवों के पुनर्वास को लेकर भी चिंता जाहिर की गई. ग्रामीणों ने कहा कि विस्थापन से पहले पुनर्वास स्थल, कृषि भूमि और जरूरी सुविधाओं की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए. इस वर्ष बारिश की कमी से फसल प्रभावित होने के बावजूद सूखा राहत को लेकर ठोस पहल नहीं होने पर भी नाराजगी जताई गई. ग्रामीणों ने रेल लाइन के सर्वे से पहले सड़क, बिजली, पेयजल और पुल-पुलिया जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाते हुए जनप्रतिनिधियों से गांवों की समस्याओं पर जवाब मांगा गया. सभा में इन मांगों को लेकर सुकमा जिला मुख्यालय में बड़ी आमसभा और पैदल मार्च की तैयारी पर भी चर्चा हुई. ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि जमीन, पुनर्वास, राहत और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों का समाधान प्राथमिकता से किया जाना चाहिए.
राष्ट्रपति के मुरिया दरबार के निमंत्रण पर सियासी सवाल
जगदलपुर. बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन को लेकर जारी निमंत्रण पत्र पर अब राजनीतिक सवाल उठने लगे हैं. बस्तर विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने निमंत्रण पत्र में स्थानीय आदिवासी जनप्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों के नाम शामिल नहीं होने पर आपत्ति जताई है. उन्होंने इतने महत्वपूर्ण आयोजन में स्थानीय प्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत बताई. मुरिया दरबार बस्तर की पारंपरिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां आदिवासी समाज के प्रतिनिधि अपनी बात रखते हैं. ऐसे में आयोजन की अतिथि सूची और निमंत्रण प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर चर्चा तेज कर दी है. विधायक की आपत्ति के बाद यह स्पष्ट होना जरूरी है कि निमंत्रण पत्र तैयार करने में किन लोगों से परामर्श लिया गया. साथ ही, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों को अलग से आमंत्रित किया गया है या नहीं, इसकी भी पुष्टि आवश्यक है. इस संबंध में संस्कृति विभाग, जिला प्रशासन और बस्तर दशहरा समिति का आधिकारिक पक्ष महत्वपूर्ण होगा. आयोजन में संस्कृति विभाग की भूमिका और अतिथियों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर भी स्पष्टीकरण की मांग उठ रही है. राष्ट्रपति की मौजूदगी वाले इस ऐतिहासिक आयोजन में स्थानीय समाज की भागीदारी को लेकर उठे सवालों का जवाब अब संबंधित विभागों से अपेक्षित है. हालांकि, निमंत्रण पत्र में नाम नहीं होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित लोगों को आमंत्रित ही नहीं किया गया. अब निगाहें प्रशासन के स्पष्टीकरण पर हैं, जिससे निमंत्रण व्यवस्था और स्थानीय प्रतिनिधित्व की स्थिति स्पष्ट हो सके.
बदबूदार हैंडपंप, फिर भी झरिया का पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
जगदलपुर. बस्तर ब्लॉक के रतेंगा ग्राम पंचायत के सालेभाटा पारा में पेयजल संकट ने ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा दी है. गांव में हैंडपंप मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार उनसे निकलने वाले पानी में दुर्गंध आती है. पानी पीने योग्य नहीं होने के कारण लोग हैंडपंप का इस्तेमाल केवल निस्तारी के लिए कर रहे हैं. पीने और खाना बनाने के लिए ग्रामीणों को खेतों में बने झरिया के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है. रतनी नाग, सुकाली और बसंती कश्यप सहित ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण गर्मी के दिनों में जलस्तर नीचे जाने से परेशानी और बढ़ जाती है. लेकिन यहां सवाल सिर्फ पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता का भी है. बस्तर ब्लॉक के बाकेल क्षेत्र में पहले फ्लोराइडयुक्त पानी के कारण लोगों की सेहत प्रभावित होने का मामला सामने आ चुका है. वहां पानी की समस्या सामने आने के बाद दो दर्जन गांवों में कोसारटेडा जलाशय से फिल्टर किया हुआ पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी. ऐसे में सालेभाटा और आसपास के गांवों के हैंडपंपों के पानी की गुणवत्ता की जांच कराना जरूरी है. ग्रामीणों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए संबंधित विभाग को समस्या की गंभीरता से जांच करनी चाहिए. सवाल यह है कि गांव में हैंडपंप होने के बावजूद लोगों को पीने के पानी के लिए झरिया पर निर्भर क्यों रहना पड़ रहा है.

दशहरा में हजारों आदिवासी आएंगे, लेकिन विश्राम भवन अधूरा
जगदलपुर. बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए दूरदराज के गांवों से हजारों आदिवासी जगदलपुर पहुंचते हैं, लेकिन उनके ठहरने की सुविधा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परियोजना अब तक अधूरी है. शहर में प्रस्तावित आदिवासी विश्राम भवन का निर्माण बजट के अभाव में आगे नहीं बढ़ सका है. लोक निर्माण विभाग ने भवन की नींव तैयार करने के बाद निर्माण कार्य रोक दिया. नतीजतन, जिस भवन से ग्रामीणों को ठहरने और आराम करने की सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वह अब तक उपयोग में नहीं आ पाया है. बस्तर दशहरा के दौरान अंदरूनी इलाकों से आने वाले आदिवासी समाज के लोगों की संख्या बढ़ जाती है. कई ग्रामीण धार्मिक रस्मों में शामिल होने के लिए एक से अधिक दिन तक शहर में रुकते हैं. विश्राम भवन नहीं होने के कारण उन्हें ठहरने के लिए दूसरी व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. इसकी जरूरत केवल दशहरा तक सीमित नहीं है, क्योंकि ग्रामीण इलाज, सरकारी कामकाज और सामाजिक आयोजनों के लिए भी जगदलपुर आते हैं. यदि भवन का निर्माण पूरा हो जाए, तो सालभर दूरदराज के गांवों से आने वाले लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. लेकिन फिलहाल बजट की कमी के चलते निर्माण अधूरा पड़ा है और सुविधा का इंतजार जारी है. ऐसे में संबंधित विभाग और प्रशासन के सामने भवन के लिए बजट उपलब्ध कराने और काम दोबारा शुरू करने की चुनौती है. बस्तर की जनजातीय संस्कृति के सबसे बड़े आयोजन के बीच अधूरे विश्राम भवन का मुद्दा ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतों पर सवाल खड़ा करता है.
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