प्रमोद कुमार, कैमूर। भभुआ जिले में 102 एम्बुलेंस कर्मचारी संघ का प्रथम राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया। बिहार राज्य कर्मचारी संघ के बैनर तले हुए इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में कैमूर ही नहीं बल्कि पूरे बिहार से आए एम्बुलेंस कर्मियों ने हिस्सा लिया और अपनी विभिन्न समस्याओं पर खुलकर चर्चा की। इस कार्यक्रम में सासाराम के सांसद मनोज राम मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जिन्होंने एम्बुलेंस कर्मियों की बदहाल स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए बिहार सरकार को घेरा और उनकी मांगों को पूरी तरह जायज बताया।

​प्राइवेट एजेंसियों और स्वास्थ्य विभाग की दोहरी प्रताड़ना

​सम्मेलन के दौरान एम्बुलेंस कर्मियों ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि उन्हें आए दिन जिला स्वास्थ्य विभाग और एम्बुलेंस संचालन करने वाली प्राइवेट एजेंसियों की दोहरी प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। यह समस्या सिर्फ कैमूर जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बिहार के एम्बुलेंस कर्मियों का यही हाल है। कर्मियों की मुख्य शिकायतों में समय पर वेतन न मिलना और वेतन में किसी प्रकार की बढ़ोतरी न होना शामिल है। अपनी इन्हीं समस्याओं को उठाने और सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए कर्मियों ने स्थानीय सांसद को इस सम्मेलन में आमंत्रित किया था।

लोकसभा में उठाएंगे आवाज

​कार्यक्रम में शामिल हुए सासाराम के सांसद मनोज राम ने एम्बुलेंस कर्मियों को आश्वस्त करते हुए बिहार सरकार को कड़े शब्दों में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि एम्बुलेंस कर्मी स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ के समान हैं। यदि यही रीढ़ कमजोर या असहज रहेगी, तो मरीजों का बेहतर इलाज कैसे संभव हो सकेगा?
​सांसद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिहार सरकार को हर हाल में इन कर्मियों की समस्याओं का जल्द से जल्द समाधान निकालना चाहिए। यदि राज्य स्तर पर इनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया, तो वे आगामी संसद सत्र के दौरान इस गंभीर मुद्दे को लोकसभा में जोर-शोर से उठाएंगे और कर्मियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ेंगे।

​समाधान नहीं हुआ तो बनेगी नई रणनीति

​बिहार राज्य चिकित्सा कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष चन्द्र प्रकाश सिंह ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि एम्बुलेंस कर्मियों की समस्याओं का उचित निदान नहीं निकाला गया, तो संघ और तमाम कर्मचारी आगे की कड़ी रणनीति बनाने को मजबूर हो जाएंगे। इस सम्मेलन के माध्यम से सरकार को एक स्पष्ट संदेश दिया गया है कि कर्मियों का धैर्य अब जवाब दे रहा है और उनकी जायज मांगों को अनसुना करना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता है।