Cancer Drug Nanotechnology: अग्नाशय के कैंसर की दवा को मुंह के जरिए देने और शरीर में उसके अवशोषण को बेहतर बनाने की दिशा में मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है। यूनिवर्सिटी के फार्मेसी विभाग की प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी और रिसर्चर शेख शाहनवाज कादिर ने नैनोटेक्नोलॉजी की मदद से यह फॉर्मूलेशन तैयार किया है।

शुरुआती परीक्षणों में सामान्य दवा की तुलना में इसके अवशोषण में 165 फीसदी से अधिक सुधार दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इस तकनीक को भारत सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है। हालांकि, अभी इसका परीक्षण लैब और पशुओं तक सीमित है। इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल होने बाकी हैं।

अग्नाशय के कैंसर की दवा पर केंद्रित है रिसर्च

इस शोध का मुख्य उद्देश्य दवा के अवशोषण को बेहतर बनाना और कैंसर कोशिकाओं पर उसके प्रभाव का अध्ययन करना है। इसके लिए नैनोटेक्नोलॉजी आधारित खास फॉर्मूलेशन विकसित किया गया, ताकि दवा को मुंह के जरिए देने की संभावना पर काम किया जा सके।

शोध के दौरान कैंसर कोशिकाओं में 31.4 फीसदी तक एपोप्टोटिक प्रभाव दर्ज किए गए। एपोप्टोसिस कोशिकाओं के नियंत्रित तरीके से नष्ट होने की प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह परिणाम शुरुआती शोध का हिस्सा है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यह तकनीक इंसानों में कैंसर का इलाज करने में कितनी प्रभावी होगी।

2021 में शुरू हुआ था शोध

प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी के मुताबिक, इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2021 में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) के तहत मिले रिसर्च ग्रांट से हुई थी। इस काम के लिए यूनिवर्सिटी में आधुनिक उपकरणों से लैस नैनो-फॉर्मूलेशन रिसर्च लैब विकसित की गई। इसी लैब में दवा के नए फॉर्मूलेशन पर काम किया गया। शोध का प्रमुख लक्ष्य शरीर में दवा के अवशोषण की क्षमता को बेहतर बनाना था।

पेटेंट मिला, लेकिन मरीजों तक पहुंचने में लगेगा समय

इस तकनीक को पेटेंट मिलना शोध की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन पेटेंट मिलने का अर्थ यह नहीं है कि दवा मरीजों के इलाज के लिए तैयार हो गई है।

फिलहाल रिसर्च लैब और पशु परीक्षण के स्तर तक पहुंची है। इंसानों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता जांचने के लिए क्लिनिकल ट्रायल जरूरी हैं। इन परीक्षणों के नतीजों के बाद ही इसके संभावित चिकित्सकीय इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

इसलिए फिलहाल इसे मौजूदा कीमोथेरेपी या रेडिएशन का विकल्प कहना जल्दबाजी होगी। अभी इसकी उपयोगिता को लेकर आगे के वैज्ञानिक परीक्षण अहम होंगे।

रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मिली पहचान

इस परियोजना से जुड़े रिसर्चर शेख शाहनवाज कादिर को ब्रिटेन की ओर से प्रतिष्ठित कॉमनवेल्थ स्प्लिट-साइट फेलोशिप मिली थी। उन्होंने अपनी पीएचडी के शोध कार्य का एक हिस्सा यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में प्रोफेसर इमरान सलीम के मार्गदर्शन में पूरा किया। इस रिसर्च पेपर को ऑस्ट्रिया की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्राज की ओर से आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में भी प्रस्तुत किया जा चुका है।

फिलहाल इस शोध की प्रमुख उपलब्धियां दवा के अवशोषण में शुरुआती सुधार और तकनीक को मिला पेटेंट हैं। आगे के क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं या नहीं, इससे तय होगा कि भविष्य में इस तकनीक का कैंसर के इलाज में कितना उपयोग हो सकता है।

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