सत्या राजपूत, रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (CGMSCL) में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी को लेकर टेंडर प्रक्रिया गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। इसकी शिकायत स्वास्थ्य मंत्री से की गई है। शिकायत के अनुसार, एक तरफ नए टेंडर बुलाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट (आरसी) को नियमों के विपरीत बार-बार बढ़ाया जा रहा है। मरीजों की दवा उपलब्धता और सरकारी खजाने के बेहतर उपयोग से जुड़ा यह मामला पारदर्शिता की कमी का उदाहरण बनता जा रहा है।

17 माह तक टेंडर नहीं खोला, फिर ‘अपरिहार्य कारण’ बताकर रद्द

दस्तावेज के मुताबिक, आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए टेंडर जारी किए गए थे। करीब 17 कंपनियों ने इनमें भाग लिया था, लेकिन करीब 17 माह तक इनकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई गई। टेंडर दस्तावेज तक नहीं खोले गए। इस लंबी अवधि में पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को जमुना कंपनी को एक्सटेंशन देकर दवाओं की सप्लाई जारी रखी गई।

22 जून 2026 को अचानक दोनों टेंडर अपरिहार्य कारणों का हवाला देकर निरस्त कर दिए गए। उसी दिन आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए चार नए टेंडर जारी किए गए। इनकी बिड जमा करने की अंतिम तारीख 14 जुलाई 2026 थी।

नया टेंडर कवर-ए खुला, प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी फिर पुराना आरसी बढ़ाया

नए टेंडर में 21 कंपनियों ने भाग लिया है। कंपनियों से अमानत राशि के रूप में 4-5 लाख रुपये जमा करवाए गए, जो लंबे समय तक फंसे रहे। अंतिम तारीख बीते 25 दिन से अधिक हो चुके हैं। कवर-ए खोला जा चुका है और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया भी पूरी हो गई है। यानी नई खरीदी की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।

इसके बावजूद अब पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा एक्सटेंशन देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सवाल उठ रहा है कि जब नया टेंडर प्रक्रिया में आगे बढ़ चुका है तो पुराने आरसी को बढ़ाने की क्या जरूरत?

नियमों का उल्लंघन: सिर्फ एक बार 6 माह का एक्सटेंशन, यहां दो बार

टेंडर नियमों के मुताबिक रेट कॉन्ट्रैक्ट को सिर्फ 6 माह तक ही एक्सटेंशन दिया जा सकता है। मूल आरसी 18 माह के लिए वैध था। बाद में इसे 6 माह के लिए बढ़ाया गया है, फिर सीजीएमएससीएल के बाद स्वास्थ्य विभाग से एक और 6 माह का एक्सटेंशन ले लिया गया है। जानकारों का कहना है कि आयुर्वेदिक रेट कॉन्ट्रैक्ट के मामले में 6 माह के एक्सटेंशन के बाद स्वास्थ्य विभाग से फिर से 6 माह का अतिरिक्त एक्सटेंशन इतिहास में पहली बार हुआ है। नियमों को ताक पर रखकर यह प्रक्रिया चलाई जा रही है।

मरीज और सरकारी खजाना दोनों प्रभावित

आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में दवाओं की उपलब्धता से सीधा जुड़ा है। टेंडर में देरी और बार-बार पुराने कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाने से कई बड़े सवाल खड़े होते हैं।

  • सरकार को प्रतिस्पर्धी दरों पर दवाएं मिल रही हैं या नहीं?
  • नई कंपनियों को बाजार में अवसर मिल रहा है या नहीं?
  • सरकारी राशि का सबसे बेहतर उपयोग हो रहा है या नहीं?

एक टेंडर को लंबे समय तक लंबित रखना, फिर रद्द करना, दोबारा टेंडर बुलाने के बाद भी प्रक्रिया पूरी न होने देना और इसी बीच पुराने आरसी को फिर बढ़ाना, इन सब पर अलग से शिकायतें भी की गई हैं।

विभाग का जवाब

सीजीएमएससीएल के प्रबंध निदेशक रितेश अग्रवाल ने कहा कि नियमों के तहत कार्य हो रहा है। प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है, इसकी जानकारी ली जाएगी।

उठते सवाल

आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए नया टेंडर जारी हो चुका है और उसका कवर-ए भी खुल चुका है। फिर पुराना रेट कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंड क्यों किया जा रहा है? अगर जल्दी है तो नया रेट कॉन्ट्रैक्ट एक सप्ताह में जारी किया जा सकता है?

पहले भी विभाग द्वारा आयुर्वेदिक दवा की खरीदी के लिए टेंडर जारी किया गया था। उसको 17 माह तक क्यों नहीं खोला गया और आखिर में किन कारणों से रद्द कर दिया गया?

आयुर्वेदिक दवाएं जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में नहीं आती हैं, फिर इतनी जल्दबाजी किसके लिए? कौन-से फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए बार-बार पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट एक्सटेंशन का खेल चल रहा है? टेंडर प्रक्रिया के नियमों को ताक पर रखकर यह व्यवस्था क्यों चलाई जा रही है?

यह मामला न सिर्फ टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि मरीजों को सही समय पर सही दवा मिलने और सरकारी धन के सदुपयोग से भी जुड़ा है। स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससीएल को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

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