बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एडीशनल एसपी) अनामिका जैन को विभागीय जांच के मामले में राहत दी है। जस्टिस विभु दत्त गुरु की सिंगल बेंच ने निर्देश दिया है कि आपराधिक मामले और विभागीय जांच में शामिल समान गवाहों के बयान विभागीय जांच में तब तक दर्ज नहीं किए जाएंगे, जब तक कि उन गवाहों की गवाही आपराधिक अदालत में पूरी नहीं हो जाती। यह मामला वर्ष 2020 में दुर्ग जिले के पुरानी भिलाई थाना क्षेत्र में दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध से जुड़ा है।

बता दें कि अनामिका जैन ने इस आदेश के लिए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। उनकी ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू ने पैरवी की। याचिका में कहा गया था कि जिस घटना को लेकर उनके खिलाफ आपराधिक मामला चल रहा है, उसी घटना और लगभग उन्हीं गवाहों के आधार पर विभागीय जांच भी की जा रही है। ऐसे में आपराधिक ट्रायल से पहले विभागीय जांच में गवाहों के बयान दर्ज होने से उनके बचाव पर असर पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मामला जुलाई 2020 में दुर्ग जिले के पुरानी भिलाई थाना क्षेत्र का है। मुतिका सोनी की मौत के मामले में अपराध दर्ज किया गया था। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 34 के तहत अपराध कायम कर जांच की थी। जांच पूरी होने के बाद मामले में सक्षम आपराधिक अदालत के समक्ष चालान पेश किया गया।
इस मामले में आरोप था कि 17 जुलाई 2020 की रात करीब 8 बजे अनामिका जैन एक अन्य महिला के साथ मृतका के घर पहुंची थीं। वहां कथित तौर पर गाली-गलौज, अपमान और मानसिक प्रताड़ना की गई थी। आरोप में यह भी कहा गया कि इस घटनाक्रम के कारण महिला ने आत्महत्या की।
आपराधिक मामले में चालान पेश होने के बाद छत्तीसगढ़ शासन के गृह विभाग ने अनामिका जैन के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच शुरू कर दी थी। विभागीय जांच में भी उसी घटना से जुड़े आरोप और गवाह शामिल थे। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच का आधार एक ही घटना है। दोनों जगह आरोपों की प्रकृति और गवाह भी समान हैं। ऐसे में अगर आपराधिक अदालत में गवाही होने से पहले विभागीय जांच में उन्हीं गवाहों के बयान दर्ज कर लिए जाते हैं, तो याचिकाकर्ता को अपना बचाव पहले ही सामने रखना पड़ सकता है। इससे आपराधिक मुकदमे में निष्पक्ष तरीके से अपना पक्ष रखने में परेशानी हो सकती है।
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया गया। इनमें कैप्टन एम. पॉल एंथनी बनाम भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम नीलम नाग (2016) और अविनाश सदाशिव भोसले बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2012) सहित अन्य फैसले शामिल थे।
अधिवक्ताओं का तर्क था कि जब आपराधिक मामले और विभागीय जांच में आरोप तथा अभियोजन के गवाह समान हों, तो पहले आपराधिक अदालत में उन गवाहों के बयान दर्ज होने चाहिए। इसके बाद ही विभागीय जांच में उनसे पूछताछ की जानी चाहिए।
सरकार ने भी रखा अपना पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप शासकीय अधिवक्ता घनश्याम कश्यप ने पक्ष रखा। शासन की ओर से दलील दी गई कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच दोनों की प्रकृति अलग-अलग होती है। आपराधिक मामले में दोष साबित करने के लिए अलग कानूनी मानक लागू होते हैं, जबकि विभागीय जांच का उद्देश्य सरकारी कर्मचारी के आचरण और सेवा संबंधी अनुशासन की जांच करना होता है।
इसलिए केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर विभागीय जांच रोकना जरूरी नहीं है। दोनों कार्यवाहियां अपने-अपने स्तर पर जारी रह सकती हैं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा और क्या दिया आदेश?
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि आपराधिक मामले और विभागीय जांच में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य और गवाह समान हैं। ऐसी स्थिति में विभागीय जांच के दौरान साझा गवाहों के बयान पहले दर्ज किए जाने से आपराधिक मुकदमे में बचाव का पक्ष प्रभावित होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अदालत का रुख यह नहीं था कि आपराधिक मुकदमा लंबित रहने तक हर विभागीय जांच पर रोक लगा दी जाए। कोर्ट ने माना कि दोनों कार्यवाहियां सामान्य तौर पर साथ चल सकती हैं, लेकिन विशेष परिस्थितियों में न्यायहित को देखते हुए उचित राहत दी जा सकती है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विभागीय जांच में उन गवाहों के बयान दर्ज करने की कार्यवाही स्थगित रखी जाए, जो आपराधिक मामले में भी गवाह हैं। जब इन साझा गवाहों के बयान सक्षम आपराधिक अदालत में दर्ज हो जाएंगे, तब विभागीय जांच में आगे की कार्यवाही कानून और सेवा नियमों के मुताबिक की जा सकेगी।
15 अक्टूबर को पारित हुआ आदेश
हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को यह आदेश पारित किया। इसके साथ ही अनामिका जैन की रिट याचिका स्वीकार करते हुए निराकृत कर दी गई।
इस आदेश का मतलब यह है कि अनामिका जैन के खिलाफ पूरी विभागीय जांच पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई गई है। फिलहाल केवल दोनों मामलों में समान गवाहों के बयान दर्ज करने की कार्यवाही पर रोक रहेगी। आपराधिक अदालत में उनकी गवाही पूरी होने के बाद विभागीय जांच आगे बढ़ाई जा सकेगी।
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