शरद पाठक, छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर उजागर करने वाला एक बेहद व्यथित करने वाला मामला सामने आया है। तामिया ब्लॉक के सुदूर गांव गंगवानी में अति-कुपोषण से जंग लड़ रहे एक साल के मासूम अतुल की जिंदगी बचाने के लिए उसकी अनपढ़ और वृद्ध दादी को अकेले ही व्यवस्था से लड़ाई लड़नी पड़ी।
वजन महज 4.5 किलो! 14 दिनों के इलाज के बाद मिली नई जिंदगी
मां के निधन के बाद गंभीर बीमारियों और अति-कुपोषण का शिकार हुए मासूम अतुल की हालत बेहद नाजुक हो गई थी:
सिस्टम की नाकामी: कुपोषण उन्मूलन के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन मासूम अतुल का वजन घटकर महज 4.5 किलोग्राम रह गया था। स्वास्थ्य अमले की अनदेखी के चलते बच्चे की जान पर बन आई थी।
दादी का संबल और एनआरसी का सहारा: गत 27 जुलाई को वृद्ध दादी अपने पोते को लेकर जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) पहुंचीं।
14 दिनों में बढ़ा 1 किलो वजन: नियंत्रण और पोषण प्रशिक्षक अंकिता साहू व डॉ. एल.एन. साहू की देखरेख के बाद बच्चे का वजन बढ़कर 5.5 किलो हुआ।

व्यवस्था पर खड़े हो रहे गंभीर सवाल
डॉक्टरों और स्टाफ की मेहनत व दादी की हिम्मत से मासूम को नया जीवन तो मिल गया, लेकिन इस घटना ने महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब तक बच्चे की सांसें थमने की नौबत नहीं आई, तब तक मैदानी अमला सोता क्यों रहा?

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